दिव्यांग सरकारी सहायता के लिए हो रहे मोहताज
- डोबा गांव में एक ही परिवार के हैं तीन दिव्यांग
- तीनों दिव्यांग ह्वीलचेयर के लिए लगा रहे सोशल मिडिया में गुहार
अल्मोड़ा, यह दर्द भरी दास्तान एक बहन और दो दिव्यांग भाइयों की है जो पैर से लाचार हैं। उनकी पीड़ा है कि वे पढ़े लिखे होने के बावजूद इन्हें अभी तक एक को भी रोजगार नहीं मिला है। ये एक अदद ह्वीलचेयर तक के लिए मोहताज हैं। यह दिव्यांग अब सोशल मीडिया के जरिए गुहार लगा रहे हैं।
दरअसल अल्मोड़ा जिले के हवालबाग विकास खंड का एक गांव है डोबा। इसी डोबा गांव के एक आम घर की कहानी अपने नाम के अनुरूप सिस्टम में पिसी नजर आती है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि गांव के एक ही परिवार में तीन दिव्यांग बच्चे हैं। जिनकी ओर से एक मार्मिक अपील सोशल मीडिया के फेसबुक प्लेटफार्म पर पोस्ट की गई है। जिसमें उनका कहना है कि उन्हें ह्वीलचेयर दी जाए। उन्होंने इसमें अपना नंबर भी दिया है।
जब इस संवाददाता ने उनके दिए गए नम्बर पर संपर्क किया तो उसने अपना नाम सौरभ तिवारी बताया। उसका कहना था कि वह और उसका भाई और सबसे बड़ी बहन तीनों दिव्यांग हैं और पढ़े लिखे होने के बावजूद उनमें से किसी एक को भी अब तक सरकारी नौकरी भी नहीं मिल पाई है, जिससे उनका जीवन बेहद मुश्किल होता जा रहा है। सौरभ ने बताया कि उनके पास ह्वीलचेयर भी टूटी फूटी हैं, जो उनकी सबसे पहली जरूरत है। सौरभ के परिवार में उसके माता पिता के अलावा बड़ी बहन और एक छोटा भाई भी है। परिवार के कुल पांच सदस्यों में से तीनों बच्चे दिव्यांग हैं। बूढ़े हो रहे माता पिता अपने बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित हैं।
सरकार से ह्वीलचेयर टूट गई
दिव्यांग सौरभ का कहना है कि सरकार की ओर से उन्हें दो बार ह्वीलचेयर दी गयी इसके बाद तीसरी बार उसने स्वयं का पैसा खर्च कर अपने लिए ह्वीलचेयर खरीदी है। उसका कहना है कि घर का बड़ा लड़का होने के चलते उसे सभी कार्यों के लिए घर से बाहर जाना पड़ता है। इसलिए उसे ह्वीलचेयर की ज्यादा जरूरत पड़ती है। उसकी स्वयं के पैसों से खरीदी ह्वीलचेयर खराब हो चुकी है जिससे दुर्घटना खतरा बना हुआ है।
परिवार को है मदद की दरकार
विषम परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे डोबा के इस परिवार को मदद की बेहद आवश्यकता है। शासन प्रशासन से अब मिले अनेक आश्वासनों के बाद यह लोग पूरी तरह से टूट चुके हैं। वर्षों बीतने के बाद भी वही कोरे आश्वासन उन्हें मिल रहे हैं। उनका कहना है कि वह तीनों पढ़े लिखे हैं लेकिन दिव्यांग होने के बावजूद उनमें से किसी के पास कोई सरकारी नौकरी नहीं है। लाचार पिता का कहना है कि जो बच्चे बुढ़ापे में उनका सहारा बनते उल्टा उनका सहारा मां बाप को बनना पड़ रहा है। पिता का कहना है कि उनके तीनों दिव्यांग बच्चों को ह्वीलचेयर, उनके घर से बस स्टेशन तक ह्वीलचेयर चलने लायक पक्की सड़क, तीनों में से किसी एक को नौकरी और परिवार के मकान बनाने हेतु हो रहे खर्च समेत इन चारों जरूरतों को पूरा करना सबसे पहली है जिसके लिए वह लगातार प्रयासरत हैं।
रिपोर्ट:- दया जोशी/ललित मोहन गहतोड़ी
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