दो साल की मासूम को जबड़े में दबाकर ले जा रहा था कुत्ता,लाठी लेकर भिड़ गई मां

  • मां की ममता ने हराया मौत को
  • 12 टांके लगे
  • अब खतरे से बाहर
  • सेरावा के आदिवासी घर में 7 मई की रात कांपी रूह
  • पलंग पर सो रही मासूम पर हमला
  • चीख सुनकर दौड़ी मां
  • जान पर खेलकर बचाया बेटी को

सेरावा/जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),दो साल की मासूम को जबड़े में दबाकर ले जा रहा था कुत्ता,लाठी लेकर भिड़ गई मां। मां और मौत के बीच जब दो साल की संगीता थी, तो चकूबाई ने मौत को चुनौती दे दी। 7 मई की रात 10 बजे नाना थाना क्षेत्र के आदिवासी गांव सेरावा में जो हुआ,उसने ममता की ताकत फिर साबित कर दी।

तनाव में युवक ने पेट्रोल पीया,खुद को आग लगाने का प्रयास

पलंग से घसीट ले जा रहा था,तभी आ गई ‘मां’
सेरावा के सवाराम गरासिया मजदूरी पर बाहर थे। पत्नी चकूबाई घर में काम निपटा रही थी। आंगन में पलंग पर 2 साल की संगीता गहरी नींद में थी,पास वाले पलंग पर उसके दो भाई सो रहे थे। घर का दरवाजा खुला था। तभी एक आवारा कुत्ता दबे पांव भीतर घुसा और सीधे मासूम पर टूट पड़ा।
उसने संगीता का सिर जबड़े में दबोचा और पलंग से नीचे गिराकर बाहर घसीटने लगा। मासूम की दिल दहला देने वाली चीख गूंजी।

लाठी उठी और रुक गई सांसें
रसोई में काम कर रही चकूबाई चीख सुनकर भागी। सामने का मंजर देख कलेजा मुंह को आ गया बेटी कुत्ते के जबड़े में तड़प रही थी। चकूबाई ने बेटी को छुड़ाने के लिए कुत्ते को खींचा,धकेला,लेकिन वह छोड़ नहीं रहा था।

फिर मां का कलेजा पत्थर हो गया। कोने में पड़ी लकड़ी उठाई और पूरी ताकत से कुत्ते पर ताबड़तोड़ वार शुरू कर दिए। एक,दो,तीन…कुत्ता तिलमिलाया और लहूलुहान संगीता को छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

12 टांके,पर मां की हिम्मत ने दी नई जिंदगी
खून से लथपथ संगीता को परिजन तुरंत नाना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए। डॉ.राजेश कुमार ने प्राथमिक उपचार कर हालत गंभीर देख पाली के बांगड़ अस्पताल रेफर कर दिया। सिर पर 12 टांके लगे हैं। डॉक्टर बोले,थोड़ी देर और होती तो मस्तिष्क में गहरा जख्म हो जाता। मां की फुर्ती ने जान बचा ली।

अब संगीता खतरे से बाहर है। ICU में लेटी संगीता की पट्टी-बंद आंखों के पास बैठी चकूबाई बस एकटक उसे देख रही है,मेरी बच्ची को कुछ नहीं होगा…।

पुलिस भी बनी मददगार
सूचना पर नाना थानाधिकारी रतन सिंह देवड़ा,भिनाना चौकी प्रभारी हिंर सिंह चौहान और बेड़ा चौकी प्रभारी तेज सिंह चौहान अस्पताल पहुंचे। खुद एंबुलेंस का इंतजाम कर संगीता को पाली रवाना कराया।

एक सवाल छोड़ गई रात
सेरावा का यह आदिवासी परिवार दिहाड़ी मजदूरी कर पेट पालता है। घर में गेट नहीं,आंगन खुला। आवारा कुत्तों का आतंक यहां नया नहीं लेकिन इस बार शिकार दो साल की मासूम बनी।

चकूबाई की हिम्मत ने बेटी को बचा लिया
सवाल वही कि गरीब की नींद इतनी महंगी क्यों? जब तक सिस्टम नहीं जागेगा,तब तक कितनी ‘चकूबाई’ को लाठी उठानी पड़ेगी? फिलहाल संगीता की सांसें चल रही हैं। और चकूबाई की ममता एक बार फिर साबित कर गई,मां होती है तो मौत भी दो कदम पीछे हट जाती है।