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शब्द संदर्भ:- (165) पर्यूषण

लेखक – पार्थसारथि थपलियाल

जिज्ञासा

जयपुर से मुकुल सैनी जानना चाहते हैं पर्यूषण शब्द का मतलब क्या है? इस शब्द का व्यापक उपयोग किस तरह किया जाता है?

समाधान

पर्यूषण शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका संधि विच्छेद करेंगे तो अर्थ चरण समझ में आ जायेगा। पर्यूषण शब्द का संधि-विच्छेद एक शब्द बने परि और ऊषण। परि जिसका अर्थ है चारों ओर और ऊषण का अर्थ है दाह करना, जला देना। इसके दो भाव हैं वह पर्व जब हम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए धर्म के दस लक्षणों के अनुसार समृद्ध करते हैं। तपस्चर्या के अनुसार स्वयं को तपाते हैं जीवन में आए दुर्गुणों को जलाते हैं, दूसरा भगवान महावीर और अन्य तीर्थंकरों के द्वारा दिया गया ज्ञान अर्जित कर तीर्थंकरों की सेवा करते हैं।

जैन आचार्यो, मुनियों,साधू/साध्वियों की सेवा करते हैं। इस अवधि में जैन परिवारों के स्त्री,पुरुष, बच्चे सभी तपस्या करते हैं। इसे दस लक्षण पर्व भी कहते हैं। सनातन धर्म से बौद्ध धर्म,जैन धर्म और सिख धर्म अस्तित्व में आए। सनातन धर्म में धर्म के दस लक्षण बताये गए हैं। लगभग वही दस लक्षण कुछ शब्द अंतर से जैन धर्म में विद्यमान हैं। ये दस लक्षण हैं- 1.उत्तम क्षमा 2 .उत्तम मार्दव 3. उत्तम आर्जव 4.उत्तम सत्य 5.उत्तम शौच 6.उत्तम संयम 7.उत्तम तप 8.उत्तम त्याग 9.उत्तम आकिंचन्य 10.उत्तम ब्रह्मचर्य। पर्यूषण पर्व (दसलक्षण पर्व) के दौरान इन दस व्रतों को धारण किया जाता है।

पर्यूषण पर्व साल में तीन बार मनाया जाता है। 1.माघ शुक्ल पक्ष (पंचमी से चतुर्दशी तक)। 2.चैत्र शुक्ल पक्ष (पंचमी से चतुर्दशी तक) और 3 भाद्रपद, इस दौरान इनमे से भाद्रपद माह में मनाया जानेवाला पर्यूषण पर्व व्यापकता से मनाया जाता है। श्वेताम्बर जैन इस पर्व को आठ दिन तक लगातार मनाते हैं। जबकि दिगंबर जैन इसे दस दिनों तक मानते हैं। आठ दिन या दस दिन तक मनाने के पीछे मुख्य ध्येय यह है कि आठ प्रकार के अंहकार/प्रमाद समाप्त हो जाय। ये हैं- अज्ञानता,संशय,मिथ्याज्ञान,राग- द्वेष,स्मृतिभ्रंश,धर्म का अनादर और योग प्रमाद। प्रमदों के मुख्य कारण या आधार है- जाति,कुल,बल,रूप,तप, लाभ,श्रुत और ऐश्वर्य।

पर्यूषण पर्व में तपश्चर्या के माध्यम से शनि,इन्द्रिय दमन,अपने दोष देखना,सदाचार, ब्रह्मश्चर्य,लालच मुक्त होना, क्रोध को नियंत्रित करना और सत्याग्रह जैसी शक्तियों का अर्जन किया जाता है। इसके लिए किसी उपासरे में व्रत, उपवास और सेवा-सत्संग के माध्यम से आचरण को शुद्ध किया जाता है।
पर्यूषण पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है। पर्यूषण का अंतिम दिन संवत्सरी कहा जाता है। इस दिन जैन समाज के लोग उन सभी से क्षमा याचना करते हैं जिन्हें उनके कारण किंचितमात्र भी मन,वचन और कर्म से कष्ट पहुंचा हो, और उन्हें क्षमा का देते हैं, जिन्होंने उन्हें कष्ट पहुंचाया हो। इसके लिए हाथ जोड़कर कहते हैं “मिच्छामि दुक्कडम”।
इस पर्व को कई नामों से जाना जाता है यथा पर्यूषण,अष्टान्हिका,दस लक्षण, क्षमत्क्षमा, खमतखम्मा आदि।

“मिच्छामि दुक्कडम”

“यदि आप भी किसी शब्द का अर्थ व व्याख्या जानना चाहते है तो अपना प्रश्न यह पूछ सकते हैं।”

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