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चारधाम: कुव्यवस्थाओं की यात्रा

राजकाज

लेखक:-पार्थसारथि थपलियाल

धाम शब्द उन पवित्र स्थलों के लिए कहा जाता है जहाँ पर भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित या प्रकट हुए हों। जब चारधाम की बात आती है तो इनमें बदरीनाथ (उत्तराखंड), द्वारिका (गुजरात), जगन्नाथपुरी (ओडिशा) और रामेश्वरम (तमिलनाडु) शामिल होते हैं। यदि बात उत्तराखंड के चारधामों की यात्रा की हो तो इसे छोटी चारधाम यात्रा कहते हैं। इसमें यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ शामिल हैं।

सनातन संस्कृति में तीर्थ यात्राओं और धामों की यात्रा से पुण्य प्राप्ति होना बताया गया है। पुराने ज़माने में जब यातायात के साधन नही थे तब यात्री हरिद्वार, ऋषिकेश से गंगाजी के किनारे किनारे बदरीनाथ, केदारनाथ तक जाते थे। बीच-बीच मे चट्टियाँ (ठहराव स्थल) होती थी। यात्रा पर जाने वाले की विदाई इस भाव से होती थी कि न जाने लौटना भी होगा या नही। यात्रा पर जानेवाला पुण्य भाव से यात्रा करता था। गढ़वाल में मेरे गाँव के एक भाई साहब उनका नाम भैरव दत्त थपलियाल था, वे संत प्रकृति के व्यक्ति थे। गांव से बद्रीनाथ की दूरी लगभग 250 -260 किलोमीटर होगी। वे बिना भोजन व्यवस्था के बदरीनाथ यात्रा पर निकल पड़ते थे। रास्ते में किसी वनस्पति के एक आध पत्ते चबा लिए तो भूख शांत हो गई। 7-8 दिनों में वे लौटकर आ जाते थे।

आज यात्रा बहुत सुगम हो गई है। ऑल वेदर रोड बन जाने से यात्रा पहले जैसी दुर्गम नही रही। यह एक तथ्य है लेकिन इस साल मई के महीने की 6 तारीख को केदारनाथ की और 8 तारीख को बदरीनाथ के कपाट कोरोना काल के 2 साल बाद तीर्थयात्रियों के लिए खुले। मंदिर के कपाट खुलने के पहले ही दिन से यात्रियों की भारी भीड़ बदरीनाथ- केदारनाथ पहुंच गई। लोगों ने जो फोटो भेजे हैं ऐसी भीड़ पहले कभी नही देखी गई। उत्तराखंड सरकार जो यात्रा सीजन से पहले कमर कस कर यात्री सुविधाएं जुटाने में लग जाया करती थी इस बार वह व्यवस्था कहीं दिखाई नही दे रही।

कुव्यवस्थाओं का अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया है। इस अव्यवस्था में सबसे बड़ी अवरोधक पर्यटन विभाग और परिवहन विभाग की वे नीतियां हैं जो नौकरशाही अंदाज़ में लागू की गई। लोग हफ्ता हफ्ता ऋषिकेश धर्मशालाओं में टिके हैं। बसों से गए यात्रियों की बुकिंग की जा रही है किसी का एक हफ्ते में नंबर आ रहा है किसी का दस दिन में। इतने दिन कोई ऋषिकेश में रुके तो क्यों रुके? समस्या तो यह भी आ रही है एक ग्रुप के कुछ लोग किसी और दिन और बचे लोग किसी और दिन। समस्या ट्रेवल एजेंट्स की भी और ऋषिकेश में होटलों की भी है। उनका बहुत सारा धन अनावश्यक व्यय हो रहा है। सरकार ने यात्रा के लिए एक पोर्टल पर नाम पंजीकृत करवाये, लेकिन सरकार ने यह विचार नही किया जो यात्री बहुत लंबी यात्रा से अपनी बसों या अन्य वाहन से पहुंचेंगे वे आगे कैसे बढ़ेंगे? धामों पर अत्यधिक भीड़ बढ़ने से वस्तुओं के दाम भी बहुत बढ़ गए।

बदरीनाथ व केदारनाथ में कड़कड़ाती ठंड है। भारी भीड़ को वहन करने की क्षमता इन तीर्थ स्थानों की नही है। उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि तुरंत रजिस्टर्ड यात्रियों की यात्रा दो दिन बाद तीन दिन के लिए विलंब करे और अपंजीकृत यात्रियों को जो पहले ही ऋषिकेश में अटके हुए हैं उन्हें यात्रा करवाने की व्यवस्था रखें। साथ ही यात्रा अनुमति पत्र के लिए अपंजीकृत यात्रियों के लिए उचित प्रावधान करे। समूह में यात्रा करने वाले यात्रियों को एक साथ यात्रा करवाएं न कि दादा को यात्रा अनुमति पत्र आज और पोते को तीन दिन बाद। पुराने लोगों की मान्यता थी कि तीर्थ यात्रा में सुविधा का क्या मतलब। उस ज़माने में तीर्थ यात्राएं पुण्य के लिए की जाती थी आज के बहुत से लोग सैर सपाटा और पर्यटन की मानसिकता को लेकर पहाड़ों की यात्रा पर निकलते हैं इसलिए उन्हें सुविधाओं की आवश्यकता रहती है। इस बार यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

इस भारी अव्यवस्था से यात्री तो परेशान हैं ही, उत्तराखंड का नाम भी डूब रहा है। यह काम प्रशासन का है। प्रशासन को बहुत सक्रिय होने की आवश्यकता है। उत्तराखंड देवभूमि है यहां हर बात में पुण्य अवश्य विचार किया जाता है। यात्रियों की युक्तिसंगत तरीके से सहायता कर प्रशासन पुण्य का भागीदार बने।

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