पितृ देवो भव का संस्कार:पितृश्राद्ध के पीछे का भाव

–श्राद्धपक्ष विशेष

✍🏻पार्थसारथि थपलियाल

भारतीय संस्कृति में मनुष्य को केवल अपने वर्तमान का प्राणी नहीं माना गया,बल्कि उसे अपने अतीत,वर्तमान और भविष्य के बीच एक जीवंत कड़ी के रूप में देखा गया है। हमारे अस्तित्व में माता-पिता, पूर्वजों,गुरुजनों और समाज का योगदान निहित है। इसी कृतज्ञता-बोध को भारतीय जीवन-दृष्टि ने संस्कार का रूप दिया।

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“मातृ देवो भव,पितृ देवो भव,आचार्य देवो भव”-तैत्तिरीय उपनिषद् का यह निर्देश भारतीय संस्कृति में माता-पिता और गुरु के प्रति श्रद्धा का आधार है। यहाँ ‘देव’ का अर्थ किसी अलौकिक सत्ता से अधिक उस व्यक्ति के प्रति सर्वोच्च सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा से है,जिसने हमारे जीवन के निर्माण में अपना योगदान दिया है।

इसी भावभूमि में पितृ श्राद्ध की परंपरा को समझना चाहिए। श्राद्ध शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। अर्थात् श्रद्धा और विश्वास पूर्वक किया जाने वाला कर्म। इसलिए श्राद्ध का मूल उद्देश्य केवल किसी निश्चित तिथि को कुछ कर्मकांड कर लेना नहीं, बल्कि उन पूर्वजों का स्मरण करना है जिनसे हमें जीवन,संस्कार, परिवार,परंपरा और सामाजिक पहचान प्राप्त हुई। यह मूलतः कृतज्ञता का संस्कार है।

भारतीय चिंतन में मनुष्य पर तीन प्रमुख ऋणों की अवधारणा मिलती है- देवऋण,ऋषिऋण और पितृऋण। पितृऋण का आशय है कि हमें जीवन देने वाले माता-पिता तथा पूर्वजों के प्रति हमारा एक नैतिक दायित्व है। इस ऋण को केवल धन या संपत्ति से नहीं चुकाया जा सकता। उनके प्रति सम्मान, उनके सद्गुणों का अनुसरण, परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह तथा आने वाली पीढ़ियों को संस्कार देना भी पितृऋण से मुक्ति का मार्ग माना गया है।

पितृश्राद्ध इसी पितृऋण की स्मृति को जीवित रखने वाली परंपरा है। श्राद्ध में तर्पण किया जाता है। ‘तृप्’ धातु से बने ‘तर्पण’ का सामान्य अर्थ है-तृप्त करना अथवा संतुष्ट करना। जल अर्पित करते हुए जब व्यक्ति अपने पितरों का स्मरण करता है,तो उसके भीतर यह भाव जागता है कि मैं अकेला नहीं हूँ; मेरे पीछे अनेक पीढ़ियों का जीवन,श्रम और अनुभव खड़ा है। यह अनुभूति व्यक्ति को अहंकार से मुक्त करती है और उसे अपनी जड़ों से जोड़ती है।

भारतीय परंपरा में पितरों का स्मरण केवल मृत्यु के बाद की किसी रहस्यमय धारणा तक सीमित नहीं है। यह स्मृति और उत्तरदायित्व का सामाजिक विधान भी है। जिस परिवार में अपने पूर्वजों का स्मरण होता है, वहाँ परिवार की परंपराओं, संघर्षों और मूल्यों की चर्चा भी जीवित रहती है। बच्चों को यह बताया जाता है कि उनके परिवार को बनाने में किन लोगों ने अपना जीवन लगाया। इस प्रकार श्राद्ध पीढ़ियों के बीच संवाद का सांस्कृतिक माध्यम बन जाता है।

पितृश्राद्ध का एक महत्वपूर्ण पक्ष दान और सेवा भी है। परंपरा में श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मण भोजन, अन्नदान,वस्त्र दान अथवा अन्य प्रकार के दान की व्यवस्था मिलती है। इसके पीछे एक व्यापक सामाजिक भाव देखा जा सकता है-अपने पूर्वजों की स्मृति को लोक कल्याण से जोड़ना। आज के संदर्भ में भी श्राद्ध के अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान,गौसेवा, वृक्षारोपण या किसी उपयोगी सामाजिक कार्य को पूर्वजों की स्मृति में करना इस परंपरा के मूल कृतज्ञता-बोध को सार्थक रूप दे सकता है।

श्राद्ध का मूल्य केवल बाहरी कर्मकांड में नहीं, उसके पीछे की भावना में है। यदि कोई व्यक्ति विधि विधान तो करता है, लेकिन जीवित माता- पिता का सम्मान नहीं करता,परिवार के बुजुर्गों की उपेक्षा करता है और अपने कर्तव्यों से विमुख रहता है,तो श्राद्ध का मूल संदेश अधूरा रह जाता है। ‘पितृ देवो भव’ हमें यह भी सिखाता है कि मृत पूर्वजों का सम्मान करने के साथ-साथ जीवित माता-पिता और वृद्धजनों की सेवा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण करते हुए मनुष्य अपने जीवन की क्षण भंगुरता पर विचार करता है। पितृ श्राद्ध का एक और गहरा पक्ष वंश और संस्कृति की निरंतरता है। मनुष्य केवल जैविक रूप से ही अगली पीढ़ी को जन्म नहीं देता वह भाषा,संस्कार, परंपरा, मूल्य, ज्ञान और जीवन-दृष्टि भी आगे पहुँचाता है। इस दृष्टि से पितृ श्राद्ध हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पहचानने और उन्हें आगे ले जाने का अवसर देता है।

इसलिए पितृश्राद्ध को केवल मृत्यु के बाद की धार्मिक क्रिया मानना उसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ को सीमित करना होगा। यह स्मृति,श्रद्धा, कृतज्ञता,उत्तरदायित्व और पीढ़ियों की निरंतरता का संस्कार है। ‘पितृ देवो भव’ का संदेश हमें बताता है कि हमारा वर्तमान किसी शून्य से उत्पन्न नहीं हुआ। हमारे पीछे माता- पिता और असंख्य पूर्वजों का त्याग,श्रम और जीवनानुभव है।

इसलिए पितृश्राद्ध का वास्तविक भाव यही है- पूर्वजों को केवल याद करना नहीं,उनके प्रति कृतज्ञ होना,उनके नाम पर केवल अर्पण करना नहीं,उनके श्रेष्ठ मूल्यों को अपने जीवन में धारण करना और उनके स्मरण को आने वाली पीढ़ियों के संस्कार से जोड़ना। यही ‘पितृ देवो भव’ की सांस्कृतिक चेतना का सार है।