सनातन संस्कृति पर राजनीतिक प्रहार
22 अगस्त 2026 को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्रता के प्रश्न पर मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा कि बचपन में स्त्री पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रहती है तथा “एक महिला को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए”; उन्होंने इन शब्दों को “शर्मनाक” बताया और कहा कि महिला स्वयं की है,किसी पुरुष की संपत्ति नहीं।
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महिला की स्वतंत्रता और गरिमा के पक्ष में खड़ा होना निश्चय ही स्वागत योग्य है। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय नारी की गरिमा सिद्ध करने के लिए सनातन परंपरा को ही कटघरे में खड़ा करना आवश्यक है? क्या हजारों वर्षों की भारतीय सभ्यता को एक स्मृति-ग्रंथ के एक श्लोक से पढ़ा जा सकता है? और क्या उस संस्कृति का मूल्यांकन करते समय गार्गी, मैत्रेयी,अपाला, लोपामुद्रा,घोषा,उभय भारती, जीजाबाई, अहिल्याबाई,रानी दुर्गावती, सावित्री फुले और लक्ष्मीबाई को भूल जाना इतिहास के साथ न्याय होगा?
राहुल गांधी ने जिस विचार का उल्लेख किया, उसका संबंध मनुस्मृति 9.3 से है-
“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
इस श्लोक की आधुनिक स्वतंत्रता और समानता की कसौटी पर आलोचना की जा सकती है,लेकिन यहीं प्रश्न उठता है,क्या इसी ग्रंथ के दूसरे श्लोक को भी उसी ईमानदारी से सामने रखा जाएगा? मनुस्मृति 3.56 कहती है-
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”
अर्थात जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है,वहाँ देवता प्रसन्न होते हैं और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता,वहाँ धार्मिक कर्म भी निष्फल हो जाते हैं।
इसके ठीक पहले 3.55 में पिता,भाई,पति और देवर द्वारा स्त्रियों के सम्मान और अलंकरण की बात कही गई है तथा 3.57 में स्त्रियों के दुःखी होने पर कुल के विनाश और प्रसन्न रहने पर कुल की उन्नति का उल्लेख है। यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेज न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने कुल्लूक भट्ट से मनुस्मृति का अनुवाद करवाया और वही आज प्रचलित मनुस्मृति है। वास्तविकता इससे कुछ अधिक जटिल है।
आज मनुस्मृति की 50 से अधिक पांडुलिपियों के प्रमाण हैं और वे सभी पाठगत रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं हैं। गीता प्रेस गोरखपुर के प्रकाशनों में मनुस्मृति नहीं मिलती उसका कारण यह बताया जाता है कि अप्रमाणिक पुस्तक को गीता प्रेस प्रकाशित नहीं करती। ऋग्वैदिक परंपरा में स्त्री केवल किसी पुरुष की पुत्री या पत्नी नहीं थी, वह मंत्रद्रष्टा भी हो सकती थी। भारत सरकार के वैदिक विरासत संबंधी एक अध्ययन में ऋग्वेद में 27 महिला ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है। अपाला, लोपामुद्रा,विश्ववारा,घोषा, रोमशा,वाक्, रात्रि आदि नाम इस परंपरा के साक्ष्य हैं।
वैदिक साहित्य में स्त्री की उपस्थिति केवल घरेलू भूमिका तक सीमित नहीं दिखाई देती। लोपामुद्रा का नाम ऋग्वेद में आता है। अपाला का सूक्त ऋग्वेद 8.91 से जुड़ा है। घोषा के सूक्त 10.39-40 में हैं। वाक् का प्रसिद्ध देवीसूक्त ऋग्वेद 10.125 में है। बृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी वाचक्नवी याज्ञवल्क्य से ब्रह्म और अस्तित्व के मूल प्रश्नों पर संवाद करती हैं। मैत्रेयी आत्मा,अमरत्व और धन के संबंध में याज्ञवल्क्य से प्रश्न करती हैं।
यदि भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव ही स्त्री को विचार करने से रोकना होता,तो गार्गी भारतीय दार्शनिक परंपरा में याज्ञवल्क्य को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करती हुई क्यों दिखाई देतीं? बाद की परंपरा में उभय भारती का प्रसंग तो और भी महत्वपूर्ण है। मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य के दार्शनिक शास्त्रार्थ की परंपरा में उभय भारती का नाम उस विदुषी के रूप में आता है जिसने निर्णायक की भूमिका निभाई और शास्त्रार्थ को ऐसे प्रश्नों की ओर मोड़ा जिनसे शंकराचार्य को भी गंभीर दार्शनिक उत्तर देना पड़ा।
19वीं शताब्दी के अंत में जब पश्चिमी समाज में भारतीय महिलाओं की स्थिति को लेकर अनेक पूर्वाग्रह मौजूद थे,तब स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम की धरती पर खड़े होकर भारतीय नारी की गरिमा का पक्ष रखा। 17 दिसंबर 1894 को कैम्ब्रिज, अमेरिका में उन्होंने “The Women of India” विषय पर व्याख्यान दिया। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि प्राचीन आर्य साहित्य में महिलाओं ने पुरुषों के समान भाग लिया और उन्होंने नारी स्वतंत्रता को प्राचीन आर्य परंपरा की विशेषताओं में गिना, लेकिन भारतीय नारी की विशिष्टता बताते हुए उन्होंने मातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया।
सरस्वती विद्या हैं। लक्ष्मी समृद्धि हैं। दुर्गा शक्ति हैं। पार्वती तप और सहधर्मिता की प्रतीक हैं। काली दुष्टता-विनाशिनी शक्ति हैं। यहाँ देवी केवल मंदिर की मूर्ति नहीं है; वह भारतीय सांस्कृतिक मानस में शक्ति की सर्वोच्च प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। जिस पुरुष के लिए उसकी पत्नी ‘अर्धांगिनी’ है, जिसके धार्मिक संस्कार पत्नी की सहभागिता के बिना अपूर्ण माने जाते हैं,जिस परिवार में ‘माता’ शब्द स्वयं श्रद्धा का पर्याय बन जाता है,उस सभ्यता को केवल एक श्लोक के आधार पर स्त्री- विरोधी घोषित करना बौद्धिक आलस्य है।
इतिहास में भारतीय नारी भारतीय इतिहास भी इसी बात की पुष्टि करता है।रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई,जीजाबाई,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, कित्तूर की रानी चेन्नम्मा,रानी कर्णावती का नाम इतिहास में साहस और राजनीतिक नेतृत्व के साथ लिया जाता है।
पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति को इस उदाहरण से समझना होगा। जर्सी गाय और थारपारकर गाय में जो अंतर पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति में है। भारत में नारी के लिए मातृत्व,शक्ति,सहधर्मिता और देवीत्व के प्रतिमान अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं। राहुल गांधी ने 2018 में पुष्कर में पूजा के दौरान परंपरा से हटकर स्वयं को दत्तात्रेय गोत्र का बताया था। गोत्र सनातन परंपरा की सामाजिक व्यवस्था है। जो पिता-दादा- परदादा के वंश से चलती है। जिसका उत्तर राहुल गांधी नहीं दे सकते।
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में नारी सबसे बढ़कर ‘माता’ है,ऐसी माता,जिसके प्रति भारतीय मन में देवत्व का भाव उत्पन्न होता है। स्वामी विवेकानंद जी ने एक अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति संन्यासी हो जाए तो उसके पिता को भी उसका सम्मान करना पड़ सकता है,क्योंकि संन्यास लेने के बाद उसका आध्यात्मिक दर्जा बदल जाता है। लेकिन उसकी माता के सामने वह संन्यासी भी सिर झुकाता है।
भारतीय नेताओं और प्रवक्ताओं को चाहिए भारतीय नारी की हजारों वर्षों की उपलब्धियों को विस्मृत मत कीजिए। भारत को बदलना है तो भारत और भारतीय संस्कृति को पहले सही ढंग से पढ़ना सीखिए। राहुल गांधी का इरादा सनातन संस्कृति के आईने में क्या समझने की आवश्यकता है।
