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31 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने बीमा क्लेम देने का दिया आदेश

6 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा

जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),31 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने बीमा क्लेम देने का दिया आदेश। राजस्थान हाईकोर्ट ने जीवन बीमा पॉलिसी के 31 साल पुराने मामले में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) को बड़ा झटका देते हुए 1995 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर दोनों अपीलें खारिज कर दिया। बीमा कंपनी का आरोप था कि पॉलिसी लेते समय महिला ने अपनी बीमारी से जुड़ी जरूरी जानकारी छिपाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों के आधार पर इस आरोप को साबित नहीं माना।

जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित ने माना कि बीमा कंपनी पॉलिसी लेते समय बीमारी छिपाने का आरोप कोर्ट में साबित नहीं कर पाई। पॉलिसी धारक के पति मंगीलाल की ओर से ब्याज दर 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की मांग भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसके तहत मंगीलाल शर्मा को बीमा राशि और 6 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया गया था।

मुकदमा लंबित रहने तक अंतिम वेतन देने के आदेश

मंगीलाल शर्मा की ओर से अधिवक्ता दिलीप कावडिय़ा,जेएल पुरोहित और राजीव पुरोहित पेश हुए। एलआईसी की ओर से भी अधिवक्ता दिलीप कावडिय़ा,जेएल पुरोहित और राजीव पुरोहित के नाम आदेश में दर्ज हैं।

पत्नी की मौत के बाद पति ने मांगा था बीमा क्लेम
मामला उदयपुर निवासी मंगीलाल शर्मा और एलआईसी के बीच विवाद से जुड़ा है। मांगीलाल की पत्नी नंदूबाई ने एलआईसी के चित्तौडग़ढ़ शाखा कार्यालय से 3 जीवन बीमा पॉलिसियां ली थीं। ये पॉलिसियां 28 मई 1986 को 40 हजार रुपये,28 जुलाई 1986 को 35 हजार रुपये और 28 जून 1987 को 50 हजार रुपये की थीं। इस तरह कुल बीमा राशि 1.25 लाख रुपये थी।

नंदूबाई के जिंदा रहने के दौरान इनका प्रीमियम भी जमा किया गया था। लेकिन नंदूबाई की 14 अगस्त 1989 को मौत हो गई। इसके बाद पति ने तीनों पॉलिसियों के आधार पर बोनस समेत कुल 1,52,150 रुपये का क्लेम किया। एलआईसी ने क्लेम देने से इनकार कर दिया।

कंपनी का कहना था कि पॉलिसी लेते समय नंदूबाई ने अपने स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी नहीं दी थी। खास तौर पर बीमा कंपनी ने थायराइड की बीमारी और उससे जुड़े तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया गया।

दूसरी ओर मांगीलाल का कहना था कि उनकी पत्नी ने कोई तथ्य नहीं छिपाया था। मंगीलाल ने कंपनी के इस फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ट्रायल कोर्ट ने बीमा राशि और ब्याज देने का दिया था आदेश उदयपुर की ट्रायल कोर्ट ने 26 सितंबर 1995 को मंगीलाल के पक्ष में फैसला सुनाया था।

ट्रायल कोर्ट ने मंगीलाल को 1,64,702 रुपये देने का आदेश दिया था। इसके साथ ही 10 जनवरी 1991 से भुगतान होने तक 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने को कहा था। इस फैसले से असंतुष्ट होकर दोनों पक्ष हाईकोर्ट पहुंचे। मंगीलाल ने ब्याज दर 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की मांग की, जबकि एलआईसी ने बीमा क्लेम और ब्याज देने के फैसले को चुनौती दी।