अहंकार विनाश का कारण है-गीता सार
कृष्णन वंदे जगद्ग्गुरुं-
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” की कविता रश्मिरथी में श्रीकृष्ण दूत रूप में दुर्योधन को अन्याय की बजाय सन्मार्ग बताते हैं-
दो न्याय अगर तो आधा दो,पर,इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,परिजन पर असि न उठायेंगे!
दुर्योधन वह भी दे ना सका,आशीष समाज की ले न सका,
उलटे,हरि को बाँधने चला,जो था असाध्य,साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर जाता है।
जन्माष्टमी पर्व शुक्रवार को कृष्ण मंदिरों में की आकर्षक सजावट
गीता में भगवान कहते हैं
“अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।” ये आसुरी प्रवृत्तियाँ मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं। श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि महानता में भी विनम्रता होनी चाहिए। शक्ति का अहंकार नहीं, शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए। विनम्रता मानवता का पहला गुण है। गीता का यह मंत्र हम सभी के जीवन को आलोकित करता रहे।
सभी मित्रों और शुभचिंतकों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
–पार्थसारथि थपलियाल
संयोजक-भारतीय संस्कृति सम्मान अभियान
सह-महामंत्री-विश्व हिंदी परिषद,दिल्ली
