बसंत पंचमी: प्रकृति संस्कृति और लोक का पर्व

बसंत पंचमी पर विशेष

(पार्थसारथि थपलियाल की कलम से)

बसंत पंचमी: प्रकृति संस्कृति और लोक का पर्व। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल तिथि-विशेष नहीं होते,वे जीवन-दर्शन के सजीव सूत्र होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही पर्व है,जहाँ प्रकृति,विद्या,लोक और संस्कार, चारों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इसे यूँ ही नहीं कहा गया कि “ऋतुनाम कूष्माकर”, ऋतुओं में बसंत सृजन,उल्लास और नवजीवन का कारण है। शिशिर की कठोरता टूटती है,धरती पीले रंग में सजती है और मनुष्य के भीतर भी नई ऊर्जा का संचार होता है।

बसंत पंचमी को यदि एक अक्षर में बाँधना हो तो वह है ‘व’। यह ‘व’ केवल वर्ण नहीं,बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों का प्रतिनिधि है-विद्या, विवेक,वाणी,विनय,विचार और विकास। विद्या से विवेक जन्म लेता है,विवेक से शुद्ध वाणी निकलती है और शुद्ध वाणी समाज में संस्कार और समरसता का निर्माण करती है। बसंत पंचमी हमें स्मरण कराती है कि बिना विद्या के विकास अंधा है और बिना विवेक के वाणी विनाशक बन सकती है। आज के समय में जब शब्दों का दुरुपयोग और अधूरी जानकारी का प्रसार बढ़ रहा है,तब ‘व’ की यह श्रृंखला और भी प्रासंगिक हो जाती है।

सरस्वती जी का जन्मदिन-ज्ञान की आराधना
बसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। श्वेतवर्णा,वीणावादिनी,पुस्तक और हंसधारिणी सरस्वती ज्ञान,कला और चेतना की देवी हैं। उनका श्वेत रंग शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक है,वीणा संगीत और लय की, पुस्तक ज्ञान की और हंस विवेक की,जो नीर-क्षीर विवेक कर सकता है। सरस्वती पूजन का आशय केवल विद्वान बनना नहीं,बल्कि संस्कारी और विवेकशील मनुष्य बनना है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका नहीं,बल्कि जीवन की दिशा तय करना है। भारतीय परंपरा में बसंत पंचमी को विद्यारंभ संस्कार का श्रेष्ठ दिन माना गया है। छोटे बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर-ज्ञान कराया जाता है। यह केवल ‘अ’ लिखने का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली ज्ञान-यात्रा का शुभारंभ है। शिक्षा जितनी जल्दी और जितनी संस्कारित होगी,समाज उतना ही सशक्त बनेगा। आज जब शिक्षा को केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित कर दिया गया है,तब बसंत पंचमी हमें शिक्षा के मूल उद्देश्य- चरित्र निर्माण और समाज-कल्याण की याद दिलाती है।

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लोक उत्सव: खेत,किसान और जीवन
बसंत पंचमी केवल मंदिरों और विद्यालयों तक सीमित पर्व नहीं,यह लोक उत्सव है। गाँवों में खेतों में लहलहाती सरसों,आम की मंजरियाँ और पीले फूल बसंत के आगमन की घोषणा करते हैं। किसान के लिए यह आशा का पर्व है। नई फसल की उम्मीद,प्रकृति की अनुकूलता और परिश्रम के फल का संकेत। पीले वस्त्र,पीले पकवान, पतंगबाजी और सामूहिक उल्लास ये सब लोक-जीवन में बसंत की पहचान हैं। यह पर्व प्रकृति और मनुष्य के बीच सहजीवन का उत्सव है,जहाँ मनुष्य प्रकृति का उपभोक्ता नहीं,सहभागी बनता है।

संत और बसंत: भीतर का उत्सव
भारतीय संत-परंपरा में बसंत का अर्थ केवल मौसम नहीं,बल्कि आंतरिक जागरण है। संत कहते हैं-जहाँ अज्ञान का अंधकार मिटे और ज्ञान का प्रकाश फैले,वहीं बसंत है। कबीर,मीरा और विद्यापति के पदों में बसंत प्रेम, भक्ति और चेतना का प्रतीक बनकर आता है। इस दृष्टि से बसंत पंचमी आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का भी पर्व है। आज जब भौतिकता, प्रतिस्पर्धा और उपभोगवाद जीवन को नियंत्रित कर रहे हैं,बसंत पंचमी हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है- प्रकृति के साथ सामंजस्य,विद्या के साथ विवेक और वाणी के साथ विनय। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो लोक से जुड़ा हो,प्रकृति-संवेदनशील हो और विद्या-आधारित हो।

जहाँ ज्ञान है,वहाँ बसंत है। जहाँ लोक है,वहाँ बसंत है और जहाँ विवेकपूर्ण जीवन है,वहाँ सदा बसंत रहता है।

आप सब को बसंत पंचमी के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं।

लेखक आकाशवाणी से सेवानिवृत कार्यक्रम अधिकारी,वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकार व लेखक हैं।