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तुम्हें गवारा नहीं था मेरा यूं बिखर जाना…प्रमोद वैष्णव

कविमित्र समूह की मासिक काव्यगोष्ठी सम्पन्न

जोधपुर,किसी के शब्दों में आक्रोश झलका,तो किसी के प्यार के तराने गूंजे,कोई शब्द चिंतित थे भविष्य को लेकर तो कुछ शब्दों में बचपन ढूंढा जा रहा था। यह मन्ज़र था बलदेव नगर स्थित धनक सभागार में आयोजित कविमित्र समूह की मासिक काव्य गोष्ठी का जिसमें शहर के उदीयमान और स्थापित शब्दशिल्पियों ने अपनी ताज़ा रचनाओं से माहौल में एक नई रवानगी पैदा कर दी।कविमित्र समूह की ओर से अशफाक़ अहमद फ़ौजदार ने बताया कि समूह की काव्यगोष्ठी का आयोजन प्रत्येक माह के पहले रविवार को नियमित रूप से किया जाता रहा है,जिसमें शहर के तमाम ऊर्जावान रचनाकार हिस्सा लेकर गोष्ठी को ऊंचाईयां बख़्शते हैं।

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मई माह की गोष्ठी की शुरूआत नवोदित रचनाकार गौतम के.गट्स ने अपनी रचना चलो आज मिलते हैं अपने आप से..,ज़मीर है पुकारता सो रहा है आज क्यों.. सुनाकर की, असम की नीरू हजारिका ने बेटी जब कल ससुराल चली जाएगी..,मुसाफिर घर जा रहे हैं,सूरज डूब रहा है.. सुनाकर माहौल को कवितामय बनाया, नवोदित रचनाकार हंसा वैष्णव ने आयो तीजो रौ त्योहार आया भादो रा त्योहार…भारत त्योहार का देश रचनाएं सुनाई,योगिता टाक ने तन्हाई है खामोशी है,पर तुम नहीं हो क्या इसी को प्यार कहते हैं.., शुभम् पाण्डे ने बेरोज़गारी सड़क पर है काग़ज़ों पर नौकरी,बातें अधूरी रहीं बस डगर में… राजेश मोहता ने न जाने कहां जाना है, यादों में तेरे शहर में रहता हूँ कौन जाने किसकी बारी है…रचना सुनाई।

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एनडी.निम्बावत ’सागर’ ने न महंगाई है ना बेरोज़गारी, सच तो यह है कि हमारी योगयताएं हम पर हैं भारी.. रचना सुनाकर गोष्ठी को परिपक्वता की ओर मोड़ा। गोष्ठी के संयोजक एवं कवि प्रमोद वैष्णव ने मुझे याद है जब हम मिले थे नदी किनारे, तुम्हैं गवारा नहीं था मेरा यूं बिखर जाना सुनाकर दाद पायी, तो वरिष्ठ कवि अशफाक अहमद फौजदार ने कृष्ण के सांवलेपन का कुछ तो असर है,राधा के कजरारे नयनों में रहने का कुछ तो असर है सुनाकर तालियां बटोरी तब दीपा परिहार राव ने ठहर सी गई है ज़ुबां अब वहीं, शब्द है ही कहां शायरी के लिये…, रचनाकार सत्यनारायण पत्नी को इस क़दर मना लिया करो, कभी आंख दिखा दो तो कभी आंखें मिला लिया करो…. बुज़ुर्ग कवि श्याम गुप्ता श्याम ने स्वर्ग का टिकट, नसबन्दी,नशाबन्दी,पति पत्नी पर चुटीले व्यंग्य सुनाते सुनाकर माहौल को कुछ व्यंग्यात्मकता पूर्ण किया,तब राजस्थानी रचनाकार वाजिद हसन क़ाज़ी ने श्याम कद दरसन देवौला, कान्हा कद दरसन देवौला सुनाई तो छगन राव ने कभी आंखें पलकें कभी दिल लिखा, तेरे होंट पर जो लगा तिल लिखा, वरिष्ठ कवि रज़ा मोहम्मद ख़ान ने जब चल पड़े क़दमों को गिनना क्या,खुशी लबों की छुपाई नहीं जाती…..तब मोहनदास वैष्णव रूकमेय ने उस समय में मैं एक बेटी थी,आज एक मां हूँ कविता सुनाई, पूर्णिमा जायसवाल ने स्त्री के किरदार को रेखांकित करते हुए मैं तो तेरे आंगन की चिड़िया हूँ रे सांवली सलोनी एक गुड़िया हूं रे कविता सुनाई । प्रमोद सिंधल ने तुम्हारी ख़ामोशी मेरे सुर कभी मिलेंगे तो रात होगी,यूं ही मिल गया था एक बार वक़्त सुनाकर गोष्ठी को ऊंचाईयां प्रदान कीं तथा अन्त में वरिष्ठ कवि एवं गीतकार दिनेश सिन्दल ने रिश्तों की डोरी जब बुनती है बेटी, कभी संवरती कभी बिखरती है बेटी सुनाकर गोष्ठी को सम्पन्न किया। काव्य गोष्ठी का संचालन पूर्णिमा जायसवाल ने किया तथा अशफाक फोजदार ने धन्यवाद ज्ञापन की रस्म अदा की।

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