चेक बाउंस के मामलों में मूल न्यायिक रिकॉर्ड जरूरी: हाईकोर्ट
कूटरचना से जुड़े मामलों में केवल प्रमाणित प्रतियां पर्याप्त नहीं
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज), राजस्थान हाईकोर्ट ने चेक अनादरण (धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम) के मामलों में आरोपी के निष्पक्ष बचाव के अधिकार को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि यदि विवाद चेक में कथित कूटरचना (इंटरपोलेशन) से जुड़ा हो,तो केवल प्रमाणित प्रतियां पर्याप्त नहीं होंगी।
ऐसे मामलों में प्रभावी जिरह के लिए मूल न्यायिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द किया पाली कोर्ट का फैसला
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी की मूल रिकॉर्ड तलब करने की अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि संबंधित रिकॉर्ड पहले से कमर्शियल कोर्ट में लंबित दीवानी वाद में उपलब्ध है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समानांतर न्यायिक कार्यवाही किसी आरोपी के वैधानिक बचाव के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।
मामला उदयपुर में लगभग 70.46 लाख रुपए के चेक अनादरण से संबंधित है। आरोपी का आरोप था कि विवादित चेक का दुरुपयोग किया गया तथा उसमें कूटरचना की गई। पुलिस जांच के दौरान मूल चेक,चेक-बुक काउंटरफॉइल और एफएसएल रिपोर्ट सहित महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए गए थे तथा जांच के बाद आरोप-पत्र भी प्रस्तुत किया गया।
आरोपी ने ट्रायल कोर्ट से मूल रिकॉर्ड मंगाने की मांग की थी ताकि शिकायतकर्ता से प्रभावी जिरह की जा सके, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज कर पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था।
हाईकोर्ट ने माना मूल दस्तावेज जरूरी
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने दलील दी कि एफएसएल रिपोर्ट में चेक और काउंटर फॉइल में कूटरचना के संकेत मिले हैं। ऐसे में मूल दस्तावेजों के बिना प्रभावी बचाव संभव नहीं है और प्रमाणित प्रतियां मूल रिकॉर्ड का विकल्प नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि जब पूरा मुकदमा उसी चेक पर आधारित है, जिसकी सत्यता विवादित है,तब मूल रिकॉर्ड आरोपी के बचाव के लिए आवश्यक है।
न्यायालय ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार केवल अभियोजन पक्ष का नहीं, बल्कि आरोपी का भी संवैधानिक अधिकार है। हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि कमर्शियल कोर्ट निर्धारित तिथि पर मूल रिकॉर्ड ट्रायल कोर्ट को उपलब्ध कराए। शिकायतकर्ता की गवाही पूरी होने के बाद रिकॉर्ड तुरंत वापस कमर्शियल कोर्ट भेजा जाए। यदि दोनों अदालतों की सुनवाई की तिथियां टकराती हैं तो आपसी समन्वय से नई तिथि निर्धारित की जाए।
