जन की आवाज़ पर डंडे
जंतर-मंतर की राहों पर,
कुछ सपने लेकर लोग चले,
हाथों में बस प्रश्न थे उनके,
न हथियार,न कोई छल।
वे न्याय की उम्मीद लिए थे,
संविधान का मान लिए थे,
पर स्वागत में जो दृश्य मिला,
वह लोकतंत्र पर प्रश्न लिए थे।
सरकारी विद्यालयों को सर्वश्रेष्ठ संसाधन देना मेरी प्राथमिकता-भंसाली
जब शब्दों से उत्तर न निकले,
तो डंडों ने संवाद किया,
घायल केवल तन ही नहीं था,
विश्वास भी लहूलुहान हुआ।
सत्ता यदि सच में जन की है,
तो जन से इतना भय कैसा?
प्रश्नों से यदि सिंहासन डोले,
तो शासन का वह बल कैसा?
चुप्पी भी अपराध बनती है,
जब अन्याय खुलेआम चले,
ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ लेना,
लोकतंत्र को धीरे-धीरे छलें।
ओपन जेल में आज सात फेरे लेंगे हत्या के दो सजायाफ्ता कैदी
इतिहास सदा यह लिखता है
आवाज़ें दबा करती नहीं,
हर लाठी की चोट के नीचे,
जन्म लेती है एक नब्ज़ नई ।
ज़रूरत केवल इतनी है,
सत्ता आईना देख सके,
जन की पीड़ा सुनने का साहस,
अपने भीतर खोज सके।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत,
न सत्ता है,न शोर बड़ा,
उसकी असली पहचान वही,
जहाँ सवाल पूछना न हो खता।
-पुलकित सिंह(समाचार वाचिका,दूरदर्शन राजस्थान)
