बिना सनातन संस्कृति के भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती

✍🏻पार्थसारथि थपलियाल

वर्तमान में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध तरह तरह के दुष्चक्र चलाए जा रहे हैं। दुष्चक्र के ये अभियान वे लोग चलाते हैं जिन्होंने भारत को गहराई से नहीं जाना। ऐसे लोग लॉर्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था और जेम्स मिल को प्रमाण मानकर चलते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से ही सनातन विरोधी वातावरण बनाया जाता रहा है।

भारत को केवल मानचित्र पर खींची गई सीमाओं से नहीं समझा जा सकता। भारत एक भूखंड से कहीं अधिक है। हिमालय से समुद्र तक फैला यह देश जितना भौगोलिक रूप से विविध है,उससे कहीं अधिक भाषायी, सांस्कृतिक,आध्यात्मिक और सामाजिक विविधताओं से समृद्ध है। अनेक भाषाएँ,पंथ, परंपराएँ,लोकाचार, जीवन-पद्धतियाँ और ऐतिहासिक अनुभव भारत की पहचान को अनेक आयाम देते हैं। फिर भी इस विराट विविधता के भीतर कुछ ऐसी सांस्कृतिक धाराएँ हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता को निरंतरता प्रदान की है। इनमें सनातन संस्कृति की परंपरा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा- व्यवस्था और जेम्स मिल जैसे औपनिवेशिक इतिहासकारों की धारणाओं में भारत को देखने का एक विशेष दृष्टिकोण दिखाई देता है। भारत को समझने के लिए उसकी अपनी सभ्यतागत स्मृति,ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता को समझना होगा।

‘सनातन’ का अर्थ केवल प्राचीन या पुराना नहीं है। सनातन का आशय निरंतर प्रवाहित और स्थायी जीवन-मूल्यों से है। सत्य,करुणा,आत्म संयम,कर्तव्य, सह- अस्तित्व और लोक कल्याण जैसे मूल्य भारतीय चिंतन में विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुए हैं। वेदों से उपनिषदों तक, रामायण-महाभारत से पुराणों तक और दर्शन से संत परंपरा तक मनुष्य और जीवन के मूल प्रश्नों पर निरंतर विचार हुआ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम् और “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” जैसे सूत्र भारतीय चिंतन की व्यापकता को सामने रखते हैं। भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता उसकी संवाद शीलता है। वैदिक परंपरा के साथ श्रमण परंपराएँ, बौद्ध और जैन चिंतन, भक्ति और सूफी धाराएँ, क्षेत्रीय लोकसंस्कृतियाँ तथा आधुनिक सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज को प्रभावित किया। यहाँ प्रश्न पूछने,तर्क करने और मतभेद रखने की परंपरा भी रही है।

उपनिषदों के संवाद और विभिन्न दर्शनों के शास्त्रार्थ इसका प्रमाण हैं। इसलिए सनातन संस्कृति को जड़ या अपरिवर्तनशील मानना उसके मूल स्वभाव के विपरीत होगा। जीवंत संस्कृति वही है जो अपने मूल मूल्यों को बनाए रखते हुए समय के प्रश्नों से संवाद करती है।
भारतीय जीवन में संस्कारों की परंपरा ने व्यक्ति को परिवार और समाज से जोड़ने का कार्य किया। जन्म से अंत्येष्टि तक संस्कारों की व्यवस्था जीवन को दायित्व और मर्यादा से जोड़ती है।

विवाह में पाणिग्रहण और सप्तपदी केवल कर्मकांड नहीं,बल्कि सहजीवन, पारस्परिक उत्तरदायित्व और जीवन-सहयात्रा के प्रतीक हैं। “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव,आचार्यदेवो भव,अतिथिदेवो भव” जैसे सूत्र परिवार और समाज में सम्मान तथा कर्तव्य की भावना को स्थापित करते हैं।

इसी प्रकार धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष की पुरुषार्थ-व्यवस्था संतुलित जीवन की भारतीय अवधारणा प्रस्तुत करती है। भारतीय चिंतन ने अर्थ और काम को जीवन से बाहर नहीं किया लेकिन उन्हें धर्म और मर्यादा से जोड़ने का प्रयास किया।

आज जब उपभोक्तावाद और असीमित प्रतिस्पर्धा जीवन के केंद्र में दिखाई देती है, तब यह विचार महत्वपूर्ण हो जाता है कि विकास के साथ विवेक, अधिकार के साथ दायित्व और सुविधा के साथ संयम भी आवश्यक हैं। भारत की सांस्कृतिक एकता भी इसी व्यापक परंपरा से जुड़े अनेक सूत्रों में दिखाई देती है।रामायण और महाभारत की कथाएँ देश के अलग- अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में जीवित हैं।

तीर्थयात्राओं,पर्वों,मेलों और सांस्कृतिक उत्सवों ने दूर-दूर के लोगों को जोड़ने का कार्य किया। चार धाम,ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ और असंख्य तीर्थों ने भारत के विस्तृत भूगोल को सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ने में भूमिका निभाई। भारत की राष्ट्रीय एकता अनेक ऐतिहासिक और आधुनिक प्रक्रियाओं का परिणाम है लेकिन सनातन सांस्कृतिक परंपरा उसकी महत्वपूर्ण आधारधाराओं में से एक रही है।

प्रकृति के प्रति भारतीय दृष्टि भी इसी संस्कृति का महत्वपूर्ण पक्ष है। नदियों को मातृरूप में देखना, वृक्षों और पर्वतों के प्रति सम्मान, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदना तथा ऋतु और कृषि-चक्र से जुड़े पर्व प्रकृति के साथ गहरे संबंध को व्यक्त करते हैं। आज पर्यावरण संकट के समय इस दृष्टि का पुनर्पाठ उपयोगी हो सकता है। विज्ञान संरक्षण के व्यावहारिक उपाय दे सकता है और संस्कृति प्रकृति के प्रति नैतिक संवेदना विकसित कर सकती है। लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने का अर्थ यह नहीं कि अतीत की प्रत्येक व्यवस्था को आदर्श मान लिया जाए।

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भारतीय समाज में असमानताएँ और अनेक सामाजिक रूढ़ियाँ भी रही हैं। ऐसा नहीं कि असमानताएं स्वतंत्र भारत में नहीं है,कई बार असमानताएं सरकारों द्वारा अपना वोट बैंक निर्धारित करने के लिए भी की जाती हैं। सामाजिक सुधार आंदोलनों ने समय-समय पर इनका विरोध किया। इसलिए सनातन संस्कृति की निरंतरता का अर्थ जड़ता नहीं, बल्कि आत्मसुधार की क्षमता भी है।

आधुनिक भारत संविधान,लोकतंत्र, समानता,स्वतंत्रता,न्याय और नागरिक गरिमा के मूल्यों पर आगे बढ़ रहा है। सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक व्यवस्था को परस्पर विरोधी मानना आवश्यक नहीं है। भारत को आधुनिक विज्ञान और तकनीक अपनानी है,आर्थिक विकास करना है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना है; साथ ही उसे अपनी सांस्कृतिक स्मृति और मानवीय मूल्यों से भी संवाद बनाए रखना है।

संस्कृति अंततः पुस्तकों और प्रतीकों में ही नहीं, आचरण में जीवित रहती है। सत्य,करुणा,संयम, कर्तव्य,परिवार,प्रकृति और लोककल्याण के मूल्य यदि जीवन में बने रहते हैं, तभी संस्कृति जीवित रहती है। भारत का भविष्य तभी अधिक सार्थक होगा,जब आधुनिकता की गति और अपनी सांस्कृतिक स्मृति की गहराई,दोनों का संतुलित संवाद बना रहे।