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लंपी डिजीज से अब तक सौ गायों की मौत, टीका भी नहीं

पशुपालकों में चिंता

जोधपुर, वेस्ट राजस्थान में इन दिनों पशुओं,विशेष रूप से गायों में तेजी से फैल रहे त्वचा रोग लंपी ने पशुपालकों की नींद उड़ा कर रख दी है। बड़ी संख्या में इस बीमारी से गायों की मौत हो चुकी है।

हर रोज पशुओं के संक्रमित होने और दम तोडऩे का सिलसिला जारी है। पशुपालन विभाग पूरी तरह से एक्टिव मोड में आ चुका है। उसकी टीमें ग्रामीण क्षेत्र में नजर आने लगी हैं, लेकिन इसका प्रभावी उपचार नहीं होने के कारण पशुपालकों को प्रभावी राहत नहीं मिल पा रही है।

बीस दिन पूर्व आया था पहला मामला

जिले के नौसर व पल्ली क्षेत्र में करीब बीस दिन पूर्व लंपी रोग का पहला मामला सामने आया था। इसके बाद इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। लोहावट व ओसियां क्षेत्र में इससे पीडि़त गायों की संख्या सबसे अधिक है। अन्य क्षेत्रों में इसकी संख्या फिलहाल अपेक्षाकृक कम है। क्षेत्र में अलग-अलग गांवों में 100 से अधिक गायों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है। सबसे बड़ी दिक्कत इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं होना है। फिलहाल डॉक्टर अनुमान के आधार पर दवा देकर इलाज कर रहे हैं।

सोलह माह में कई राज्यों में फैला

गांठदार त्वचा रोज अफ्रीका व पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में होने वाला स्थानीय रोग है। जहां वर्ष 1929 में इस रोग के पहली बार लक्षण देखे गए। दक्षिण पूर्व एशिया बांग्लादेश में इस रोग का पहला मरीज वर्ष 2019 में सामने आया था। भारत जैसे सबसे अधिक पशुओं वाले देश में यह महज सोलह माह के भीतर पंद्रह राज्यों तक फैल गया। भारत में पहला मामला मई 2019 में ओडिशा में सामने आया था।

पशुओं में आखिर क्या है लंपी डिजीज

यह मुख्य रूप से बाह्य परजीवियों मच्छर इत्यादि के काटने से होता है। इसका वायरल संक्रमित जानवर से सीधे स्वस्थ जानवर तक भी संपर्क में आने से पहुंच जाता है। संक्रमण के बाद एक से दो सप्ताह तक वायरल खून में रहता है। इसके बाद मुंह से निकलने वाली लार से चारा दूषित हो जाता है। इसे खाने से अन्य जानवर भी चपेट में आ जाते हैं। सबसे पहले जानवर की आंख व नाक से पानी आना शुरू होता है। लसिका ग्रंथियां सूज जाती हैं। एक सप्ताह तक तेज बुखार भी रहता है। दूध का उत्पादन कम हो जाता है।

अब तक टीका भी नहीं बना

पशु विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरल रोग है। इस कारण इसका कोई प्रभावी उपचार नहीं है। यदि शुरुआत में ही उपचार शुरू कर दिया जाए तो पशु पूरी तरह से ठीक हो सकता है।

ग्रसित पशु को अन्य पशुओं से रखें दूर

संक्रमित पशुओं को अन्य पशुओं से एकदम अलग कर देना चाहिये। एक साथ चरने के लिए भी नहीं छोड़ा जाना चाहिये। प्रभावित क्षेत्र में पशुओं की आवाजाही को रोक देना चाहिये। संक्रमित पशु के पास जाने वाले लोगों को सैनिटाइज करना चाहिये।

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