विनम्र स्मरण: भुवन चंद्र खंडूड़ी
लेखक -पार्थसारथि थपलियाल

उत्तराखंड की राजनीति में सादगी,ईमानदारी और अनुशासन का पर्याय रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का 19 मई को लंबी बीमारी के बाद निधन केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व का अवसान नहीं,बल्कि सार्वजनिक जीवन में आदर्श मूल्यों की एक महत्वपूर्ण परंपरा के क्षीण होने जैसा है। सैनिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आए खंडूड़ीजी उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने सत्ता को कभी विशेषाधिकार नहीं,बल्कि सेवा का माध्यम माना। उनके निधन से उत्तराखंड ही नहीं,पूरे देश ने एक ऐसे जननेता को खो दिया है जिसकी पहचान शुचिता,राष्ट्रनिष्ठा और कार्यसंस्कृति से थी।

उत्तराखंड के पूर्व CM बीसी खंडूरी का निधन

गढ़वाल की धरती से निकले खंडूड़ी जी भारतीय सेना में मेजर जनरल के पद तक पहुंचे। सेना का अनुशासन,स्पष्टता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संस्कार उनके पूरे राजनीतिक जीवन में दिखाई देता रहा। राजनीति में प्रवेश के बाद भी उन्होंने कभी अपने सैनिक चरित्र से समझौता नहीं किया। यही कारण था कि वे भीड़ जुटाने वाले नेता से अधिक विश्वास अर्जित करने वाले राजनेता के रूप में पहचाने गए।

उत्तराखंड जैसे नवोदित राज्य को जब स्थिर प्रशासनिक सोच और साफ-सुथरे नेतृत्व की आवश्यकता थी,तब खंडूरी जी ने मुख्यमंत्री के रूप में राज्य को दिशा देने का प्रयास किया। सड़क, आधारभूत संरचना और प्रशासनिक सुधारों को लेकर उनकी गंभीरता स्पष्ट दिखाई देती थी। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उत्तराखंड की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों को समझते हुए उन्होंने संपर्क मार्गों और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया।

खंडूड़ी जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे राजनीति में नैतिकता के पक्षधर थे। आज जब राजनीति पर अवसरवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं,तब खंडूड़ी जी का जीवन एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आता है। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाया। उत्तराखंड में भूमि और प्रशासनिक मामलों में पारदर्शिता लाने की उनकी कोशिशें आज भी याद की जाती हैं। वे जानते थे कि पहाड़ का विकास केवल घोषणाओं से नहीं,बल्कि ईमानदार कार्यसंस्कृति से संभव है।

उनकी सादगी भी उतनी ही चर्चित थी जितनी उनकी प्रशासनिक दृढ़ता। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उनमें अहंकार का लेशमात्र नहीं था। आम जनता से सहज संवाद और कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीय व्यवहार उन्हें विशिष्ट बनाता था। राजनीतिक विरोधी भी उनकी ईमानदारी और शालीनता का सम्मान करते थे। आज के समय में जब राजनीति का स्वर अक्सर कटु और आक्रामक दिखाई देता है,तब खंडूरी जी जैसे संयमित नेताओं की कमी और अधिक महसूस होती है।

उत्तराखंड की राजनीति में खंडूड़ी जी एक नैतिक धुरी की तरह थे। उन्होंने यह संदेश दिया कि विकास और नैतिकता साथ-साथ चल सकते हैं। उनके कार्यकाल में खंडूड़ी है जरूरी” जैसा जननारा केवल राजनीतिक प्रचार नहीं था,बल्कि जनता के भरोसे की अभिव्यक्ति थी। लोगों को विश्वास था कि यह नेता व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राज्यहित में निर्णय लेने की क्षमता रखता है।

उनका निधन उस पीढ़ी के क्रमशः विदा होने का संकेत भी है जिसने राजनीति को राष्ट्रसेवा का माध्यम माना था। आज नई पीढ़ी के राजनेताओं के लिए खंडूड़ी जी का जीवन प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए। सार्वजनिक जीवन में शुचिता,अनुशासन और जनसेवा के जो मानक उन्होंने स्थापित किए,वे लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

उत्तराखंड की जनता उन्हें केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में नहीं,बल्कि पहाड़ की संवेदनाओं को समझने वाले सच्चे जनसेवक के रूप में याद रखेगी। उनका जीवन यह सिखाता है कि पद की प्रतिष्ठा व्यक्ति से नहीं बढ़ती, बल्कि व्यक्ति अपने आचरण से पद को गौरव प्रदान करता है। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का जाना एक युगांतकारी क्षति है,किंतु उनके आदर्श और कार्यशैली आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।
दिवंगत आत्मा को शत शत नमन।।