स्वच्छंदता से कलुषित होती संस्कृति

✒️-पार्थसारथि थपलियाल

एक प्रोफेसर साहब क्लास रूम में अपने स्टूडेंट्स को श्लील और अश्लील पर व्याख्यान दे रहे थे। शिष्यों की जिज्ञासा पर उन्होंने बताया सभ्य होते समाज ने नग्नावस्था से सभ्यता की सीढ़ियों पर चलना सीखा। उसने खान,पान, रहन-सहन को उन्नत बनाया। संबंधों को मर्यादित किया। इन सब के उजले पक्ष को सामाजिक मान्यता दी। मान्यताओं को संस्कारित किया। तब देश या समाज की संस्कृति पल्लवित हुई। किसी व्यक्ति के अथवा समाज के कार्य व्यवहार / रहन सहन,बात-विचार में या प्रदर्शन में सामाजिक मान्यताओं का प्रचलन ही श्लील है। जो श्लील नही है या जिस व्यवहार से शील भंग हो वह अश्लील है। उसे बोलचाल की भाषा में फूहड़ कहते हैं। जहाँ मानवीय गरिमा मंद पड़ी वहाँ अपसंस्कृति ने पैर पसारे। प्रोफेसर साहब उस संस्कृति में पले बढ़े थे जिसमें सामाजिकता थी और उसमें सामाजिक मान मर्यादाएं कूट कूट कर भरी हुई थी।

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भारत में पाश्चात्य संस्कृति के संक्रमण, नवजात्य धनाढ्यों की बिगड़ी संतानों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अमर्यादित लोगो,चार्वाक दर्शन के अनुयायियों ने भारतीय संविधान में स्थापित पवित्र शब्द “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” को अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता बना दिया। इस आड़ में वे अपने कुकृत्यों पर स्वतंत्रता का जलाभिषेक कर समाज को विद्रुपित कर रहे हैं। सभ्य समाज चुप है। वह जानता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग करने वाले कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित लोगों ने जब 2011 में दिल्ली में slut walk का आयोजन इस लिए किया था क्योंकि वे भारतीय नारी की सामाजिक बेड़ियों को इस फूहड़ चाल (slut walk) से काटना चाहते थे।

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संस्कृति विहीनता और धनलोलुपता ने इंसान को इतना गिरा दिया है कि वह अपनी तमाम स्वछंदताओं को संविधान प्रदत्त अधिकार बताकर दूसरों के शीलयुक्त होने के अधिकार का अतिक्रमण माफिया बनकर कर रहा है। सोशल मीडिया इन्ही विष बेलों से भरा पड़ा है। OTT प्लेटफॉर्म हो,यूट्यूब,इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, रील.
या अन्य कोई मंच,सभी का हाल एक जैसा। सामाजिक मर्यादाओं को रूढ़िवादी मानसिकता बता कर मिटाया जा रहा है। बाप-बेटी, बहन- भाई,मामा-भांजी,सास-दामाद के रिश्ते जिस कदर कलुषित किये जा रहे हैं उससे यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ….. का विचार धूल धूसरित हो रहा है। नग्नता और फूहड़ता को आधुनिकता के रूप में स्थापित किया जा रहा है। समाजचिन्तकों,सभ्य लोगों ने मौन धारण करना उचित मान लिया है, न जाने कब कौन रही सही भी उतरवा दे।

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डर तो यह है जब दिल्ली मेट्रो जैसे भीड़भाड़ वाले यात्रा साधन में ऐसे दृश्य आम हो रहे हों,या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता को बढ़ावा दिया जा रहा हो तो लगता है किसी माँ के बेटे या किसी बहन के भाई के जेल जाने के दिन बहुत निकट हैं। इन स्वेच्छाचारी लोगों का कहना है शर्म तो देखने वालों की नज़र में होती है। यह नही बताते ऐसा देखने वाला कौन है? क्या एक सामान्य आदमी के अधिकारों का अतिक्रमण नही हो रहा है? फिर अश्लीलता से संबंधित कानून क्यों है। भारतीय दंड संहिता की धाराएं 292, 293, 294 तथा स्त्री अश्लील रूपण प्रतिषेध अधिनियम 1986 क्यों है? क्या सरकार सो रही है या अनदेखी कर रही है। कई लोग हैं जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के इशारों पर नग्नताओं और बेहयापन को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि उनका व्यापार बढ़ सके। क्या कामुक प्रदर्शन से समाज का वह वर्ग जो इस जाल जंजाल को नही समझता है वह उद्दीपित नही होगा? सम्भव है वह किसी ग्रे एरिया में अपराध कर बैठेगा। एक शायर ने क्या खूब लिखा-

सभी कहते हैं कि रख नज़र नीची अपनी
कोई उनसे नही कहता न निकलो यूं बयां होकर।।

कई बार अहसास होता है इस आधुनिक पढ़े लिखे समाज से बेहतर पहले के लोग रहे हैं जिन्होंने महिलाओं के प्रति सम्मान को पाप और पुण्य की दृष्टि से विवेचन किया। नारी को समाज में अग्रणीय स्थान दिया। लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, देवी-देवता, राधा-कृष्ण, माता-पिता, बहन-भाई आदि सभी स्थानों में नारी तू नारायणी कह कर प्रथम स्थान दिया गया है।
एक शायर ने यह बात सार रूप में कह दी है-

कुछ न दिखता था अंधेरे में, मगर आंखें तो थी।
ये कैसी रोशनी आयी कि लोग अंधे हो गए।।

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