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ब्राजील के कलाकारों ने सीखे राजस्थान की लोककला के रंग

समकालीन कला और पारंपरिक शिल्प का सांस्कृतिक संगम सरेचा में हुआ साकार

जोधपुर,ब्राजील के कलाकारों ने सीखे राजस्थान की लोककला के रंग। ब्राज़ील-इंडिया कलाकार आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत जोधपुर के निकट सरेचा गांव में लोककला के रंग विदेशी कलाकारों पर नजर आ रहे हैं। राजस्थान जोधपुर स्थित सरेचा गाँव में फार्म स्टूडियो,स्थानीय क्यूरेटर वगाराम चौधरी और मोनिक रोमेको के मार्गदर्शन में ब्राज़ील और भारतीय कलाकारों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान आर्ट ऐज़ फूड रिचुअल एंड ऑफरिंग प्रोजेक्ट के तहत समकालीन कला और पारंपरिक शिल्प को एक साथ लाने का एक अनूठा मंच उपलब्ध हुआ है। जिसमें स्थानीय कारीगरों और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के बीच गहरे संवाद स्थापित हुए।

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दस दिन के इस साझा प्रोजेक्ट के तहत ब्राजील के कुल 5 कलाकारों ने स्थानीय कलाकार वागाराम चौधरी के साथ ग्रामीण पारंपरिक कामो को जाना और समझा। ब्राज़ीलियन कलाकार और क्यूरेटर रेजिना कारमोना ने बताया कि अपने कलात्मक अनुसंधान को विकसित करने के लिए पर्यावरण,स्थानीय परंपराओं और समकालीन दृष्टिकोणों का सही संयोजन मिला।

कलाकार फ्लाविया फर्नांडीस, क्रिस्टीना बेल्फ़ोर्ट,डिजाइनर सोनिया एलिसा डी लीमा लिमोंगे,टेरिमाँ बेल्फ़ोर्ट के साथ रेजिना कारमोना ने अलग- अलग विधाओं में ग्रामीण कलाकारों के साथ अपनी कला व विचारों को मूर्त रूप प्रदान किया। अपने अनुभव साझा करते हुए ब्राजीलियन आर्टिस्ट फ्लाविया फर्नांडीस ने स्थानीय शिल्प तकनीकों को यादगार अनुभव बताया।

कलाकार क्रिस्टीना बेल्फ़ोर्ट ने भारत की परंपराओं और आधुनिकता के संतुलन को पुरानी परंपराओं,मंदिरों और शिल्प से जोड़ते हुए अपनी रचना ‘रट से बीज तक’ में इसे दर्शाया। सोनिया एलिसा डी लीमा लिमोंगे,जो एक डिजाइनर और कलाकार हैं,ने भारत में अपने अनुभव को बचपन के सपने के साकार होने जैसा बताया।

कलाकार टेरिमाँ बेल्फ़ोर्ट ने कहा कि जो बात मुझे सबसे ज़्यादा छू गई,वह थी पारंपरिक तकनीकों का अनुभव। जैसे पीढ़ियों से चलती आ रही मिट्टी और पानी से बने बर्तन और 700 साल पुराने कपड़ा शिल्प। इस संस्कृति में रहकर यह देखना बेहद ताज़गीभरा रहा कि लोग आज भी अपने संसाधनों का सम्मान करते हुए परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

यह कार्यक्रम समकालीन और पारंपरिक कला के बीच की खाई को पाटते हुए कला की सार्वभौमिक भाषा के माध्यम से संस्कृति और इतिहास का जश्न मनाने का एक बेहतरीन उदाहरण साबित हुआ। यह कला की सार्वभौमिक भाषा, आधुनिक और प्राचीन परंपराओं को जोड़ते हुए सांस्कृतिक रचनात्मकता का उत्सव समकालीन कला सांस्कृतिक संगम सिद्ध हुआ।

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