छह दिवसीय कंटिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन कार्यक्रम का शुभारंभ
आयुष अनुसंधान,अग्र्य औषधियों,आधुनिक इमेजिंग तकनीक एवं शल्य चिकित्सा की नवीन पद्धतियों पर व्याख्यान
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),छह दिवसीय कंटिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन कार्यक्रम का शुभारंभ। डॉ.सर्वपल्ली राधा कृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय,जोधपुर के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद में सोमवार को छह दिवसीय सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। 26 से 31 अक्टूबर तक आयोजित इन कार्यक्रमों का संचालन द्रव्यगुण विभाग एवं शल्यतंत्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।
कार्यक्रमों का उद्देश्य आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान,आधुनिक चिकित्सा तकनीकों तथा नवीन अनुसंधान के बीच समन्वय स्थापित करना और शिक्षकों एवं चिकित्सकों के व्यावसायिक कौशल को विकसित करना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर (वैद्य) गोविंद सहाय शुक्ल की अध्यक्षता में हुआ।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय,जामनगर की कुलपति प्रो.डॉ मानसी देशपांडे उपस्थित थीं। विशिष्ट अतिथियों में प्रो.डॉ रबि नारायण आचार्य, महानिदेशक,केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (ष्टष्टक्र्रस्),नई दिल्ली; प्रो.पी. हेमंता कुमार, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर तथा प्रो. सुमन शर्मा,राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर शामिल थे।
इस अवसर पर कुलगुरु प्रोफेसर शुक्ल ने कहा कि आयुर्वेद की समृद्ध शास्त्रीय परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रमाण- आधारित चिकित्सा पद्धतियों से जोडऩा वर्तमान समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम शिक्षकों, चिकित्सकों एवं शोधार्थियों को नवीनतम ज्ञान,आधुनिक तकनीकों और अनुसंधान की संभावनाओं से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसे आयोजन आयुर्वेद की ?चिकित्सकीय उपयोगिता को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ शैक्षणिक गुणवत्ता एवं व्यावहारिक कौशल के विकास में भी सहायक हैं। द्रव्यगुण विभाग द्वारा आयोजित सेमिनार के प्रथम दिन प्रो. रबि नारायण आचार्य ने ‘आयुष अनुसंधान एवं अनुक्त द्रव्य’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने आयुर्वेद में अनुक्त द्रव्यों की अवधारणा, उनके अध्ययन की आवश्यकता तथा आयुष अनुसंधान की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने औषधीय द्रव्यों के वैज्ञानिक अध्ययन, उनके गुणधर्मों के मूल्यांकन तथा चिकित्सकीय उपयोग की संभावनाओं के संबंध में प्रतिभागियों को जानकारी दी।
गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर की कुलपति प्रो. मानसी देशपांडे ने ‘अग्र्य औषधियों की तार्किकता’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट्ट संहिताओं में वर्णित अग्र्य औषधियों की अवधारणा,उनके चयन के आधार तथा आयुर्वेद चिकित्सा में उनकी महत्ता को विस्तार से समझाया। उन्होंने शास्त्रीय सिद्धांतों के संदर्भ में अग्र्य औषधियों के तार्किक एवं चिकित्सकीय महत्व को रेखांकित किया।
प्रथम दिन शल्य चिकित्सा के विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान एवं प्रायोगिक सत्र आयोजित किए गए। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर के प्रोफेसर डॉ.सुमन शर्मा ने ‘डायग्नोस्टिक रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग तकनीकें: उपयोग और नवीन विकास’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने निदानात्मक रेडियोलॉजी एवं इमेजिंग तकनीकों के उपयोग,उनमें हुए नवीन विकास तथा शल्य चिकित्सा में उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
ट्रेन छूटने से महज 5 मिनट पहले खुला राज,एसी कोच में मिली शराब की खेप
उन्होंने आचार्य सुश्रुत के अनुसार शारीरिक चोटों के महत्व एवं अस्थिभंग के सामान्य प्रबंधन पर भी व्याख्यान दिया। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान,जयपुर के प्रो.डॉ.पी.हेमंता कुमार ने ‘क्षारकर्म: समकालीन ज्ञान एवं नवीन विकास’ विषय पर व्याख्यान एवं प्रायोगिक प्रदर्शन किया। उन्होंने आयुर्वेद की पारंपरिक क्षारकर्म चिकित्सा पद्धति के व्यावहारिक पक्षों तथा इसके क्षेत्र में हुए नवीन विकास की जानकारी दी।
इसके अतिरिक्त उन्होंने गुदा एवं मलाशय संबंधी रोगों में लेजर तकनीक और उनके प्रबंधन में नवीन विकास विषय पर व्याख्यान दिया। इसमें संबंधित रोगों के उपचार में लेजर तकनीक की भूमिका तथा आधुनिक चिकित्सकीय प्रगति पर चर्चा की।
देश के विभिन्न राज्यों से प्रतिभागियों की सहभागिता
दोनों कार्यक्रमों में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षक, चिकित्सक एवं शोधार्थी सहभागिता कर रहे हैं।कार्यक्रमों के लिए विभिन्न राज्यों से 30- 30 प्रतिभागियों का चयन किया गया है। कर्नाटक,ओडिशा, महाराष्ट्र,हिमाचल प्रदेश,मध्य प्रदेश एवं बिहार सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों को विषय विशेषज्ञों के अनुभवों से सीखने तथा अपने ज्ञान एवं व्यावहारिक कौशल को विकसित करने का अवसर मिल रहा है।
कार्यक्रमों का आयोजन द्रव्यगुण विभागाध्यक्ष के प्राचार्य प्रो.चंदन सिंह तथा शल्यतंत्र विभागाध्यक्ष प्रो.राजेश गुप्ता के दिशा- निर्देशन में किया जा रहा है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के डीन आयुर्वेद प्रो.गोविंद गुप्ता, डीन रिसर्च प्रो.देवेंद्र चाहर, परीक्षा नियंत्रक प्रो.राजाराम अग्रवाल,चिकित्सालय अधीक्षक प्रो.ए.नीलिमा,रचना शरीर विभागाध्यक्ष प्रो.महेंद्र शर्मा,यूसीएच के प्राचार्य प्रो. गौरव नागर, यूसीएनवाईएस के प्राचार्य प्रो.चंद्रभान शर्मा, उप कुलसचिव डॉ.मनोज अदलक्खा,आईटी प्रभारी प्रो.हरीश सिंघल एवं प्रभारी अधिकारी मीडिया प्रो.दिनेश शर्मा उपस्थित थे।
इनके अतिरिक्त एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र पुरविया, डॉ.विष्णु दत्त शर्मा एवं डॉ.नीरज शर्मा तथा असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.राजीव सोनी एवं डॉ.प्रेम प्रजापत सहित विश्वविद्यालय के अन्य संकाय सदस्य भी मौजूद थे। छह दिवसीय कार्यक्रम के आगामी सत्रों में विशेषज्ञ व्याख्यान, शल्य चिकित्सा के प्रायोगिक प्रदर्शन तथा विभिन्न चिकित्सकीय विषयों पर चर्चा आयोजित की जाएगी।
यह पहल आयुर्वेद के शिक्षकों, चिकित्सकों एवं शोधार्थियों को नवीन अनुसंधान प्रवृत्तियों से परिचित कराने,शैक्षणिक ज्ञान के आदान-प्रदान तथा व्यावहारिक कौशल विकास के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगी।
