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लम्हों ने ख़ता की थी,सदियों ने सज़ा पाई

(पार्थसारथि थपलियाल की कलम से)

समाज को बाँटने वाली नीतियाँ और तात्कालिक राजनीतिक संतुलन साधने की प्रवृत्ति लंबे समय से अनेक विसंगतियों को जन्म देती रही हैं। कभी धर्म,कभी जाति और कभी भाषा के आधार पर समूहों को संतुष्ट करने की कोशिशों ने असंतोष की समानांतर धारा भी पैदा की है। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कुछ नियमों को लेकर उठा विवाद इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का असंतुलन केवल संस्थानों तक सीमित नहीं रहता,उसका प्रभाव सामाजिक संबंधों और वैचारिक वातावरण पर भी पड़ता है।

इन विवादों का सबसे प्रत्यक्ष असर उस सहयोगी संस्कृति पर पड़ता है, जिसकी आवश्यकता विविधता से भरे समाज में सबसे अधिक होती है। जब नीति-निर्माण में पारदर्शिता और व्यापक संवाद का अभाव रहता है,तब विरोध के स्वर स्वाभाविक रूप से उग्र होते हैं। यह स्थिति उन समूहों को अवसर देती है जो टकराव को ही राजनीति का औजार मानते हैं। परिणामस्वरूप वास्तविक शैक्षणिक प्रश्न-गुणवत्ता, समान अवसर और अकादमिक स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और बहस भावनात्मक ध्रुवीकरण तक सिमट जाती है।

राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस संदर्भ में विचारणीय है। अक्सर देखा गया है कि वे स्पष्ट पक्ष रखने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं, क्योंकि किसी भी निर्णय से उनके पारंपरिक समर्थन आधार पर प्रभाव पड़ सकता है। यह मौन समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि असमंजस को बढ़ाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा नीति पर खुली बहस और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को स्थान देना आवश्यक है,ताकि असंतोष संस्थागत संवाद में परिवर्तित हो सके,न कि सड़क पर उतरने वाले टकराव में।

कुछ चिंतक यह सुझाव दे रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय सुनाने तक आक्रोश को संयम में रखा जाए। न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखना लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है, विशेषकर तब जब मामला संवैधानिक व्याख्या और अधिकारों से जुड़ा हो। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय न केवल कानूनी दिशा तय करेगा,बल्कि नीति-निर्माण की सीमाओं और उत्तरदायित्वों को भी स्पष्ट करेगा। किंतु यह प्रतीक्षा केवल समय काटने का साधन नहीं होनी चाहिए; इसे आत्ममंथन के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। नीतियों का नियमित मूल्यांकन होना चाहिए और तेज़ी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप परिवर्तन होना चाहिए। ऐसे युवा तैयार हों जो जो सामाजिक ताने बाने को अटूट रखते हुए विकास की गति को निरंतर बढ़ाते हुए देश को एक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में ला खड़ा करें।

सतीश अणथ्वाल श्रीज्वालपा देवी सिद्धपीठ के पुनः अध्यक्ष निर्वाचित

मूल प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक समरसता को बढ़ा रही है या अनजाने में नए विभाजन पैदा कर रही है। भेदभावपूर्ण या असंतुलित ढाँचा किसी भी समाज में दीर्घकालिक स्थिरता नहीं ला सकता। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं,बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो आलोचनात्मक सोच रखें,विविध मतों का सम्मान करें और अवसरों की समानता को स्वीकार करें। इसके लिए नीति को विचारधारा से ऊपर उठकर गुणवत्ता और समावेशन पर केंद्रित होना होगा।
शिक्षा नीति पर होने वाली बहस को भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप से मुक्त कर ठोस तथ्यों और सामाजिक प्रभावों के आधार पर आगे बढ़ाना आवश्यक है। यदि उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति है,तो रास्ता वही चुना जाना चाहिए जो अधिकाधिक लोगों को साथ लेकर चले। गुणवत्तापूर्ण,सर्वसमावेशी और संतुलित शिक्षा व्यवस्था ही सामाजिक समरसता की वास्तविक आधारशिला रख सकती है।

ख्यातनाम शायर मुजफ़्फ़र रज्मी ने यह शेर चेतावनी के रूप में लिखा होगा-
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी,सदियों ने सज़ा पाई।।

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