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परिवाद में गवाही के बाद पुलिस जांच का आदेश अवैध

राजस्थान हाईकोर्ट

जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),परिवाद में गवाही के बाद पुलिस जांच का आदेश अवैध। अधीनस्थ न्यायालय में परिवाद पेश होने के पश्चात होने वाली कार्रवाई को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।

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हाईकोर्ट की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि परिवाद पेश होने के पश्चात न्यायालय द्वारा धारा 200 एवं 202 सीआरपीसी के तहत परिवादी व उसके गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज कर लिए जाते हैं तो, उसके बाद उस मामले को पुलिस जांच के लिए नहीं भेजा जा सकता हैं।

न्यायाधीश संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने यह आदेश परिवादी दिनेश प्रजापत की ओर से दायर आपराधिक विविध याचिका पर सुनवाई के पश्चात दिया। याचिका में अपर मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट संख्या-3 जोधपुर के उस आदेश को चुनौती दी गई थी,जिसमें गवाहों के बयान दर्ज होने के उपरांत फाइल को जांच के लिए महामंदिर पुलिस थाने भेज दिया गया था।

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हस्तीमल सारस्वत एवं रेखा साखंला ने पैरवी की। परिवादी ने अपनी पत्नी के खिलाफ बिना तलाक लिए दूसरा विवाह कर लेने के आरोप में परिवाद पेश किया था, जिसमें परिवादी तथा उसके गवाहों के बयान कोर्ट में दर्ज हो चुके थे,उसके पश्चात मजिस्ट्रेट ने मामले को जांच के लिए पुलिस को प्रेषित कर दिया था।

याचिका पर बहस करते हुए अधिवक्ता हस्तीमल सारस्वत ने तर्क दिया कि कोर्ट में बयान दर्ज होने के बाद मजिस्ट्रेट को स्वयं साक्ष्यों का मूल्यांकन कर फैसला लेना होता है। साक्ष्यों के बयान लेने के पश्चात परिवाद को जांच के लिए पुलिस को भेजना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है।

सारस्वत ने पूर्व न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में कोर्ट के पास केवल दो ही विकल्प रहते हैं,या तो धारा 203 सीआरपीसी के तहत परिवाद खारिज किया जाए या धारा 204 के तहत आरोपियों को समन जारी किया जाए, जबकि लोक अभियोजक ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने कानूनी प्रक्रिया का कोई उलघंन नहीं किया है और अधीनस्थ न्यायालय का आदेश न्याय संगत है, इसलिए परिवादी की याचिका को खारिज किया जाए।

सुनवाई के पश्चात न्यायाधीश संजीत पुरोहित ने याचिका को स्वीकार करते हुए अधीनस्थ न्यायालय को निर्देश दिया है कि वह उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर ही स्वमं मूल्यांकन कर नियमानुसार आगे का आदेश पारित करे।

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