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लोकतंत्र के मंदिर में अध्यक्ष की रेवड़ियाँ

संविधान की मर्यादा (2)

-पार्थसारथि थपलियाल

इन दिनों उत्तराखंड विधानसभा बहुत चर्चा में है। चर्चा का कारण कोई लोक कल्याण का अधिनियम बनाना नही है। जिन अच्छे विषयों पर अधिनियम बने हैं, वे धूल फांक रहे हैं। नियम तो वे लागू हुए जिनके अधिनयम भी नही थे। उत्तराखंड के लोग उत्तराखंड भू काननू के लिए आंदोलन चलाये हुए हैं,उस पर कोई कानून नही बन पाया। उत्तराखंड से पलायन रोकने के लिये पिछली सरकारों में एक पलायन आयोग बना,सिंगल मैन आर्मी की तरह एक अधिकारी नियुक्त हुए थे उन्हें एक उपयुक्त दफ्तर की व्यवस्था उत्तराखंड सरकार नही दे पाई थी। उनको नियमानुसार वेतन मिलता रहा। उन्होंने उत्तराखंड से लोगों का पलायन किस तरह रोका होगा, यह बात सोचनीय भी है और चिन्तनीय भी।

संस्कृत भाषा को उत्तराखंड राज्य की दूसरी भाषा आदेशों में बनाया गया लेकिन संस्कृत भाषा के संवर्धन के लिए ऐसा कुछ नही किया गया जिस पर देवभूमि उत्तराखंड गर्व कर सके। उत्तराखंड पहला राज्य है जिसने लोकायुक्त नियुक्त किया। जबकि उत्तराखंड में अधिकतर व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई हैं। ऐसा भी नही कि कुछ न किया गया हो, बहुत कुछ किया गया। जो किया गया वही उत्तराखंड का नाम डुबोने के लिए काफी है।

2012 से 2016/17 के मध्य उत्तराखंड में सरकार कोंग्रेस की थी। विधानसभा के अध्यक्ष डॉ गोविंद सिंह कुंजवाल बनाये गए। विधानसभा अध्यक्ष संवैधानिक पद है, उसमें कम गुंजाइश होती है,आखिर कमाने का कोई रास्ता तो ढूंढना चाहिए। उन्हें प्रकाश स्तंभ की तरह दिखाई दिए, वे थे अपर सचिव जगदीश चंद्रा। गैरोला जी मुख्य सचिव थे कुछ समय बाद वे उच्चन्यायालय में नियुक्ति पा लेते हैं। इस जगह पर जगदीश चंद्रा को पहले प्रभारी सचिव और बाद में सचिव बना दिया जाता है। विष्णुचक्र थपलियाल जो उत्तराखंड नया राज्य बनने पर हिमाचल विधानसभा से अवर सचिव (Under Secretary) पद का वर्षों के विधायी अनुभव के साथ उत्तराखंड विधान सभा में नियुक्त हुए थे, वे विधि स्नातक भी थे और विधान सभा अध्यक्ष कुंजवाल के समय अपर सचिव के रूप में उत्तराखंड विधान सभा में वरिष्ठता के साथ थे। वे विधान सभा नियमावली के अनुसार कार्य करनेवाले अधिकारी थे। डॉ कुंजवाल को चंद्रा ने अपने पक्ष में करते हुए अध्यक्ष के विशेषाधिकार का मंत्र पढ़ाकर अपनी मुट्ठी में बंद कर दिया और अपनी नियुक्ति सचिव पद पर करा दी। जबकि नियम यह है कि सचिव पद पर नियुक्त किया जानेवाला अधिकारी विभागीय हो, वह विधि स्नातक हो, उसे विधायी कार्यो का कमसे कम 10 वर्षों का अनुभव हो।
यह भी प्रावधान है कि यदि उपयुक्त अधिकारी न मिले तो विधि और न्याय मंत्रालय से अधिकारी की व्यवस्था की जा सकती है। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के मनसूबे कुछ और थे।

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चंद्रा ने बहुत सुनियोजित ढंग से 2016 में अपनी सेवा शर्तों में संशोधन करवा लिया कि सेवाकाल पूर्णता प्राप्त होने पर अध्यक्ष सचिव की सेवा 3 साल विस्तार दे सकते हैं। यदि इस अधिकारी की और आवश्यकता हो तो विधि मंत्रालय को प्रस्ताव भेजकर विस्तार दिया जा सकता है। अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए चंद्रा ने वित्त नियंत्रक को पोस्ट नही होने की भी व्यवस्था कर ली ताकि उन्हें मनमानी करने की खुली छूट मिलती रहे। उस काल के दस्तावेजों की जांच हो तो पूरा दस्तावेज विशेषाधिकारों की पाप की गठरी है। चंद्रा ने 3 साल का सेवा विस्तार लिया और अधिक विस्तार की उम्मीद थी, लेकिन उनके सपने टूट गए। जो व्यवहार चंद्रा ने थपलियाल के साथ किया था, वह रिपीट हुआ। मुकेश सिंघल को सचिव बनाया गया। चंद्रा को और विस्तार नही दिया गया। सिंघल शोधकर्ता थे। उन्हें पदीय व्यवहारिक ज्ञान नही था। उन्होंने तमाम नियमों को किनारे रखते हुए विधान सभा में 32 भर्तियां करवा दी। इसके 3-4 दिन बाद ही अपना दोहरी वेतनवृद्धि करवा दी। कहावत है जब मामा परोसने वाला हो तो भानजे की तो पौ बारह होनी ही है।

उत्तराखंड को वहां के लोग देवभूमि मानते हैं। राजनीति में बैठे बंदरबांट करने वाले लोग देवभूमि की जनता को उसी के हाल नरभक्षी जंगली जानवरों की दया में रखना चाहते हैं, ताकि ये सफेदपोश तमाम नियमों की खिल्ली उड़ाकर वे मौज मस्ती करते रहें। “संविधान की मर्यादा” सीरिज उसका दर्पण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में कहा था इस देश में रेवड़ियाँ खूब बंटी हैं सबका हिसाब मांगा जाएगा। वर्तमान में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वच्छ छवि, अनुशासन प्रिय और जनता के दुःख दर्द को समझने op वाले हैं, संघ की पृष्ठभूमि से हैं वे प्रभावी कदम उठाने में हिचकते नही, दूसरी ओर विधान सभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी स्वयं योग्य हैं निष्कलंक पिता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी (पूर्व मुख्यमंत्री) की सुपुत्री हैं। दोनों इस रेवड़ी की कलंक कथा को गंगा जल से धोकर यशस्वी उत्तराखंड की उज्ज्वल गाथा लिखेंगे।

संविधान की मर्यादा का क्या हुआ ? प्रेम की कलंकित कहानी …..आगामी अंक में….ये कहानी है दीये और तूफान की…
क्रमश: 3

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