Parthasarathy Thapliyal

माननीयों की शपथ:जनता लतपथ

राष्ट्रप्रथम

पार्थसारथि थपलियाल

कभी-कभी मन कसमसाता है कि लोकतंत्र का सच क्या है? फिर सोचता हूँ कि भारत की प्रबुद्ध जनता के चुने हुए प्रतिनिधि विधायिका में बैठे अच्छा ही कर रहे होंगे? चुनाव होते हैं छाँटते लोग, तब पद की शपथ लेते हैं कुछ लोग। बड़े सपनों को मूर्तरूप देने के लिए काम करना शुरू करते हैं। जिन्हें मलाईदार विभाग मिल जाते हैं वे इसके लिए विशेष कार्याधिकारी नियुक्त कर लेते हैं। लगता है कि ऐसा होना ही चाहिए ताकि मंत्री जी के दिन प्रतिदिन के काम में गतिशील हाथ लगें और काम पूरे किए जा सकें। जिसे बुरा मानना है मानता रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि मुझे मालूम है कि गड़बड़ी कहाँ है, ज्यादा होशियारी की तो 1947 से अब तक जितना खाया है जबड़े में हाथ डाल कर निकालना मुझे आता है।

मैं हैरान होता हूँ एक सांसद चुने जाने के लिए एक आदमी 5-10 करोड़ रुपया खर्च कर देता है। वह इसका 10 गुना तो कामना चाहेगा। वरना घोड़ा गाड़ी बंगला कहाँ से आएगा? घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो भूखों मरेगा। वह घूसखोरी नही करेगा तो भरपाई कैसे करेगा? उदहरण मीडिया के माध्यम से जग जाहिर हैं। महाराष्ट्र का किस्सा हमें याद होगा एक मंत्री ने किस तरह एक पुलिस अधिकारी को नियुक्त किया कि महीने के सौ करोड़ या.. उगाही करो। या कोई मंत्री अंडरवर्ड से मिलकर अवैध धंधों में लगा है। एक नेता दिल्ली में घर घर दारू पहुंचा रहा है तो पंजाब में नशाबंदी की बात करता है। रेत-बजरी का अवैध धंधा हर राजनीतिक दल का एजेंडा है। ट्रांसफर पोस्टिंग तो महामहिम की काम धेनु होती है। नौकरी पेशा आदमी 60 साल की उम्र तक 2 कमरे का मकान नही बना पाता है। एक प्रधान या सरपंच छः महीने में एक स्कॉर्पियो का मालिक बन जाता है। दल कोई भी हो। अब हाल सभी के एक जैसे हैं। मुट्ठीभर लोग हैं जिनका ईमान कोई डिगा नही पाया।

महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ी जा रही है। वर्तमान में महंगाई को डील करने का तरीका लोकतांत्रिक नही यह नौकरशाही तरीका है। कीमत बढ़ा दो। वे असली राजा हैं जीनके हाथ मे प्रशासनिक शहक्ति होती है। वे सुझा देते हैं रेट बढा देते हैं कभी डीजल -पेट्रोल या घरेलू गैस की कभी खाद्यानों की। यही नही कमाई का तरीका ये भी है चालान की रेट बढ़ाने से पुलिस के रेट भी बढ़े हैं। दो हज़ार का चालान कट रहा हो तो पुलिस वाला पांच सौ से कम में मानता नही। आपको प्रसन्नता होती है चालान काटने से बच गया। ये काम पहले 50 रुपये में हो जाता था। अंधाधुंध कमाई होती है प्रॉपर्टी डीलरों से या दारू के ठेकों से।

बड़े उद्योग से जुड़े लोग तो सुपारी देते हैं। नोएडा के प्रॉपर्टी डीलरों ने बड़ी कोशिश की थी कि सपा सरकार आ जाय ताकि उनके वारे न्यारे हो जाय। ईश्वर ने उनकी नही सुनी। नोएडा अथॉरिटी वालों की सुनी ताकि उनकी कमाई चलती रहे। उत्तराखंड में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। इक्कीस सालों में रेत बजरी, ट्रांसफर पोस्टिंग, प्लाटिंग और कई तरह के स्थानीय उद्योग बढ़े हैं। जिनसे जनता का कोई भला नही। कार्यपूर्णता का प्रमाणपत्र केंद्र सरकार को समय पर चला जाता है। ब्लॉक की मशीनरी, जिला परिषद पंच प्रधान मिलकर कागजों में विकास करने पर लगे हैं।

अगर किसी भाई की प्रज्ञा जाग्रत हो तो कृपया बताएं कि हमारे माननीय जो शपथ लेते हैं उसकी पवित्रता की जांच की कोई व्यवस्था लोकतंत्र में है? किसी पार्टी का जो घोषणापत्र होता है क्या कभी कोई व्यवस्था है कि आपने जो घोषणा की थी उनमें से किन किन घोषणाओं पर काम शुरू हो गया या घोषणा पूरी हो गई। जो नेता एक दल से दूसरे दल में ससुराल की तरह चले जाते हैं क्या उनकी मंशा की जांच के लिए कानूनी व्यवस्था नही होनी चाहिए? क्या इस बात की व्यवस्था नही होनी चाहिए कि भारत की संस्कृति और सभ्यता और राष्ट्रहित के विरुद्ध किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को बोलने या उनके विरुद्ध कार्य करने या मंशा रखने वालों को दंडित किया जाय?

उन सभी को बधाई जो इन दिनों अपने सौभाग्य के लिए शपथ ले रहे हैं। कभी मौका मिले तो उन मुरझाए चेहरों या समस्याओं से लतपथ मतदाताओं की शपथ भी ले लेना जिनकी कृपा से शपथ का अवसर मिल रहा है। प्रतिनिधि होना दुष्कर कार्य है। खासकर वे लोग जो विचारधारा के हैं उनसे उम्मीद रहती है कि वे आम आदमी ही रहें।

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