टूट रहे संयुक्त परिवार, विरूपित होते लोक संस्कार

सनातन संस्कृति-3

टूट रहे संयुक्त परिवार, विरूपित होते लोक संस्कार,विषय को लेकर लेखक ने सनातन संस्कृति और संयुक्त परिवार की सार्थक विवेचना की है। पाठकों के लिए यह लेख किस्तों में प्रकाशित किया गया है। इसे आप भी पढ़िए और नई पीढ़ी को भी पढ़ाईए। आज पढ़िए अंतिम किश्त।

भारत की महान परंपरा, संयुक्त परिवार,हमारे अपने ही कारणों से बर्बाद हो रही है। जब समाज नैतिक मूल्यों की अनदेखी करता है तो उसे पतन की ओर जाने से रोकना कठिन हो जाता है। इस बिंदु पर समाज को व्यापकता से विचार करने की आवश्यकता है। समाधान किसी एक पक्ष को दोष देने में नहीं, बल्कि संस्कारों को पुनः स्थापित करने में है। परिवार,शिक्षा और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी, सम्मान और मर्यादा का भी ज्ञान मिले।

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विवाह जैसे पवित्र बंधन को केवल व्यक्तिगत निर्णय मानकर परिवार और समाज की भूमिका को पूरी तरह नकार देना भी एकतरफा दृष्टिकोण है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना गया है,जहाँ अनुभव और मार्गदर्शन का भी महत्व होता है। इसी प्रकार,आधुनिकता के नाम पर यदि हम अपने आचरण में मर्यादा और शालीनता को त्याग देते हैं,तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक प्रभाव भी डालता है। वस्त्र,व्यवहार और भाषा,ये सभी व्यक्ति के संस्कारों को दर्शाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया जाए,बल्कि यह कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए। “जो मन करे वही करो” का दृष्टिकोण यदि बिना विवेक के अपनाया जाए,तो वह व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है। बड़ों का सम्मान करना, उनके अनुभवों से सीखना और परिवार की मर्यादा को बनाए रखना,ये केवल पुराने जमाने की बातें नहीं हैं,बल्कि आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। जो समाज अपने बुजुर्गों का आदर करना भूल जाता है,वह अपने ज्ञान और परंपरा की जड़ों को कमजोर कर देता है। इसी प्रकार,बिना सूचना के घर छोड़ देना या अपनी जिम्मेदारियों से भागना स्वतंत्रता नहीं,बल्कि अपरिपक्वता का संकेत है।

यह भी सच है कि आज के समय में वैश्वीकरण और तकनीक ने नई-नई संस्कृतियों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। परिवार के बिना समाज की कल्पना अधूरी है और समाज के बिना राष्ट्र का अस्तित्व संभव नहीं। इसलिए परिवार को सशक्त बनाना,उसकी मर्यादा को बनाए रखना और उसकी परंपराओं को आगे बढ़ाना हम सभी का कर्तव्य है। यह भी सच है कि आज के समय में वैश्वीकरण और तकनीक ने नई-नई संस्कृतियों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। इनमें से कुछ सकारात्मक हैं,जैसे शिक्षा का प्रसार, समानता की भावना और व्यक्तित्व विकास के अवसर। परंतु यदि हम बिना सोचे-समझे हर चीज़ को अपनाने लगते हैं,तो अपनी मौलिक पहचान खो सकते हैं।

फूहड़ता और अशालीनता को “आधुनिकता” समझ लेना एक भ्रम है। सच्ची आधुनिकता वह है,जो प्रगति के साथ-साथ मूल्यों को भी बनाए रखे। हम मर्यादा,सम्मान,संयम और जिम्मेदारी जैसे मूल तत्वों को अपने जीवन में बनाए रखें,तो कोई भी परिवर्तन हमारी संस्कृति को कमजोर नहीं कर सकता। बल्कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं,जो आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी।’इति कथा’..