लोकतंत्र में लोकमत और राजमत का चिंतन

भारत के लोकजीवन में लंबे समय से एक वैचारिक तूफान दिखाई दे रहा है। आम जनता जो लोकतंत्र में लोक का रूप है वह और राजमत जिसमें तमाम संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं,सत्ता पक्ष- प्रतिपक्ष,शासन की संसदीय परम्परा, कार्यपालिका और न्याय पालिका शामिल हैं, लोकतंत्र में राजमत लोकमत से शक्ति प्राप्त करता है और संविधान की मर्यादा में उस शक्ति का उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग करता है। हाल के वर्षों में भारतीय लोकतंत्र में कहीं न कहीं सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष की लोकतांत्रिक गतिविधियों में लोकमत की अवहेलना हो रही है।

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आज स्थिति यह है कि कोई संविधान की दुहाई देकर उसके मूल भाव की अवहेलना करता दिखाई देता है तो कोई संविधान की रक्षा का दावा करते हुए उसकी मर्यादाओं को अपने राजनीतिक हित के अनुरूप व्याख्यायित करता है। संविधान केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, समानता,न्याय और बंधुता का सामाजिक अनुबंध है। उसकी प्रतिष्ठा तभी बनी रह सकती है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों उसके अक्षर के साथ-साथ उसकी आत्मा का भी सम्मान करें।

मतदाता सूची का अद्यतन हो अथवा निर्वाचन व्यवस्था से जुड़ी कोई शिकायत-ये लोकतांत्रिक अधिकार और सरोकार हैं। कमियों की सूचना लिखित रूप में दी जा सकती है,निर्वाचन अधिकारियों से संवाद किया जा सकता है, प्रतिनिधिमंडल भेजा जा सकता है और आवश्यकता होने पर शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन भी किया जा सकता है लेकिन क्या हर असहमति का उत्तर सड़क बाधित करने, सामान्य जनजीवन प्रभावित करने और समाज को उद्वेलित करने से ही दिया जाएगा? यदि आंदोलन नागरिक अधिकार है तो निर्बाध जीवन भी आम नागरिक का अधिकार है।

इसी तरह न्याय और नागरिक अधिकारों के प्रश्नों पर भी राजनीतिक संवेदनशीलता समान होनी चाहिए। किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक कारावास में रहना पड़ा हो और बाद में न्यायालय से उसे ससम्मान रिहा किया जाता हो,इस स्थिति का मूल्यांकन कौन करेगा? जिस व्यक्ति की सजा के दौरान पूरा घर चौपट हो गया हो,जिसने योवन का सुख न भोगा हो,अपराध में उसकी संलिप्तता न रही हो,उसके 20 साल किस आधार पर बर्बाद हुए,? इस अपराध का दंड किसे मिलना चाहिए। इस पर संविधान की दुहाई देने वाले सभी मैं है। क्योंकि आम आदमी के न्याय को दलाल रौंद डालते हैं। यह केवल किसी व्यक्ति की त्रासदी नहीं,बल्कि न्याय- व्यवस्था और प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। ऐसे मामलों पर राजनीतिक चुप्पी यह प्रश्न अवश्य खड़ा करती है कि क्या न्याय का प्रश्न भी राजनीतिक सुविधा के अनुसार देखा जाने लगा है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है,लेकिन स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। संस्कृति,समाज और परंपराओं पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है; किंतु अभिव्यक्ति के नाम पर किसी समुदाय,परंपरा अथवा भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जानबूझकर अपमानित करना सामाजिक संवाद को मजबूत नहीं करता। इसी प्रकार निजी मीडिया और डिजिटल माध्यमों की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण है,परंतु स्वतंत्रता के नाम पर अपसंस्कृति,सनसनी और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देना स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण नहीं कहा जा सकता।

समानता का अधिकार भी केवल संवैधानिक शब्द नही रहा। जब समाज में आर्थिक असमानता बढ़ती है,जब अवसरों का वितरण असंतुलित दिखाई देता है अथवा जब न्याय की प्रक्रिया सामान्य नागरिक को असमान अनुभव होने लगती है,तब लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं। संविधान की शपथ केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। वह सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं से निष्पक्षता,न्याय और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है।

सबसे बड़ा प्रश्न लोकमत और राजमत के संबंध का है। मतदाता मतदान के दिन केवल सरकार चुनता ही नहीं,वह अपनी आकांक्षाओं,असंतोष और अपेक्षाओं को भी व्यक्त करता है। गरीबी- अमीरी की बढ़ती खाई, रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य, न्याय और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्न लोकमत के केंद्र में हैं। यदि राजनीतिक विमर्श इन वास्तविक प्रश्नों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप, ध्रुवीकरण और राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

सत्ता पक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत शासन का अधिकार देता है,मनमानी का नहीं। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता पैदा करना उसका अधिकार नहीं। दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि वे लोकमत को सुनें, समझें और उसका सम्मान करें। लोकमत को राजमत का शत्रु नहीं, उसका मार्गदर्शक बनना होगा और राजमत को लोकमत का दमनकर्ता नहीं,उसका संवैधानिक प्रतिनिधि। तभी समानता, न्याय और स्वतंत्रता संविधान के पन्नों से निकलकर भारत के जनजीवन की वास्तविक अनुभूति बन सकेंगे।

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