राष्ट्रबोध के बिना सुरक्षित-संरक्षित भारत की कल्पना अधूरी
राष्ट्र प्रथम
लेखक:पार्थसारथि थपलियाल
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह हजारों वर्षों की सभ्यता,संस्कृति, विविधताओं,संघर्षों और साझा स्मृतियों से निर्मित राष्ट्र है। इसकी शक्ति केवल संविधान, संसद,न्यायपालिका,सेना, प्रशासन या आर्थिक विकास में नहीं,बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना में भी निहित है जो नागरिकों को यह बोध कराती है कि व्यक्तिगत, राजनीतिक और संस्थागत हितों से ऊपर राष्ट्र और समाज का व्यापक हित है।
भारत के संविधान ने शासन और सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व की स्पष्ट मर्यादाएँ निर्धारित की हैं। राष्ट्रपति के पद की शपथ में संविधान और कानून की रक्षा तथा जनता के कल्याण के प्रति समर्पण की बात है। मंत्रियों की शपथ में संविधान के प्रति निष्ठा, भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा तथा बिना भय या पक्षपात के सभी लोगों के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार का संकल्प है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की शपथ में भी संविधान और कानून को बनाए रखने तथा बिना भय,पक्षपात, अनुराग या द्वेष के कर्तव्य निभाने का स्पष्ट उल्लेख है।
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की अपनी- अपनी संवैधानिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियाँ हैं। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता हैं,लेकिन मतभेद जब सामाजिक वैमनस्य में बदलने लगें,तब चिंता स्वाभाविक है। चुनाव जीतना लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य नहीं है; लोकतंत्र का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था कायम करना भी है जिसमें असहमति के बावजूद समाज साथ रह सके।
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आज सार्वजनिक विमर्श में राजनीतिक भाषा का स्तर कई बार चिंता उत्पन्न करता है। जाति,धर्म,क्षेत्र और समुदाय से जुड़े संवेदनशील प्रश्नों पर सार्वजनिक मंचों से कही गई बातें समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करती हैं। किसी राजनीतिक नेता का एक वक्तव्य उसके समर्थकों के लिए केवल भाषण हो सकता है, लेकिन समाज के किसी दूसरे हिस्से के लिए वह अविश्वास,आक्रोश अथवा असुरक्षा का कारण बन सकता है।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, पर उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार न्यायपालिका पर प्रश्न उठाना और न्यायिक निर्णयों की आलोचना करना दो अलग बातें हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक निर्णयों पर विधिक और सार्वजनिक विमर्श की गुंजाइश रहती है,लेकिन न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा और कानून के शासन के प्रति सम्मान भी आवश्यक है। संविधान की शपथ लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा केवल इतनी नहीं होनी चाहिए कि वह शब्दों को दोहरा दे; अपेक्षा यह भी होनी चाहिए कि वह उन शब्दों को अपने आचरण का मार्गदर्शक बनाए।
कानून बनाना संसद और विधानसभाओं का महत्वपूर्ण अधिकार है। सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार कानूनों में परिवर्तन भी लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन किसी भी कानून की सार्वजनिक स्वीकृति और उसकी सामाजिक उपयोगिता पर विचार करते समय यह प्रश्न अनिवार्य है कि क्या वह न्याय, समानता, संविधान के मूल मूल्यों और व्यापक लोकहित की कसौटी पर खरा उतरता है। कानून का उद्देश्य समाज को व्यवस्थित करना है,उसे स्थायी खांचों में बाँटना नहीं।
यही वह बिंदु है जहाँ राष्ट्रबोध की आवश्यकता सामने आती है।राष्ट्रबोध का अर्थ किसी दल विशेष के प्रति निष्ठा नहीं है। इसका अर्थ किसी सरकार का समर्थन करना भी नहीं है। राष्ट्रबोध का अर्थ है, भारत की संप्रभुता,अखंडता,संवैधानिक व्यवस्था,सामाजिक एकता और नागरिकों के व्यापक हित को व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर रखने की चेतना। सत्ता में रहने वाला व्यक्ति राष्ट्रहित में निर्णय करे और विपक्ष में रहने वाला व्यक्ति भी राष्ट्रहित को राजनीतिक असहमति से ऊपर रखे, यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कार है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक ताना-बाना हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। भाषा,धर्म,जाति,क्षेत्र और परंपराओं की विविधता के बावजूद हम एक राष्ट्र हैं। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाज के भीतर स्थायी अविश्वास पैदा करने लगे,यदि जातीय और सांप्रदायिक पहचानें नागरिकता की साझा पहचान पर हावी होने लगें,यदि प्रत्येक संस्था को केवल राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे,तो लोकतंत्र की संस्थाएँ भले बनी रहें,लेकिन लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर हो सकती है। इसलिए राष्ट्रबोध की आवश्यकता केवल राजनेताओं को नहीं है।
नागरिकों में भी राष्ट्रबोध उतना ही आवश्यक है। प्रशासन में राष्ट्रबोध का अर्थ है,नियमों का निष्पक्ष पालन और नागरिक के प्रति उत्तरदायित्व। न्याय व्यवस्था में इसका अर्थ है- संविधान और कानून के प्रति निष्ठा। मीडिया में इसका अर्थ है- तथ्य और जिम्मेदार अभिव्यक्ति। शिक्षण संस्थानों में इसका अर्थ है-ऐसे नागरिकों का निर्माण जो अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझें। और सामान्य नागरिक के लिए राष्ट्रबोध का अर्थ है कि असहमति के अधिकार का प्रयोग करते हुए भी दूसरे नागरिक के सम्मान और देश की एकता को नष्ट न किया जाए।
राजनीति समाज को दिशा देने का माध्यम है। यदि राजनीति समाज को जोड़ती है तो वह राष्ट्र निर्माण की शक्ति बनती है; यदि वह समाज को स्थायी वैमनस्य में बाँट देती है तो अंततः उसकी कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। सत्ता आती-जाती रहती है,सरकारें बदलती रहती हैं,राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती रहती है, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है।
राष्ट्र प्रथम केवल एक उद्घोष नहीं,सार्वजनिक जीवन की वह कसौटी होना चाहिए जिस पर व्यक्ति,संस्था और व्यवस्था अपने आचरण को परख सके। क्योंकि समाज का ताना-बाना टूट गया तो राजनीति की विजय भी अंततः राष्ट्र की पराजय ही होगी।
