एमजीएच के आईसीयू में 42 दिन जिंदगी-मौत से जूझी प्रसूता को मिला नया जीवन
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),एमजीएच के आईसीयू में 42 दिन जिंदगी-मौत से जूझी प्रसूता को मिला नया जीवन। महात्मा गांधी हॉस्पिटल के आईसीयू में पिछले 42 दिनों से जिंदगी और मौत की जंग में जूझ रही एक प्रसूता को सफल इलाज के बाद पूर्ण स्वास्थ्य लाभ के साथ आज डिस्चार्ज किया गया।
प्रसूता का लगभग 42 दिन पहले उम्मेद हॉस्पिटल में सिजेरियन सेक्शन हुआ था। अत्यधिक रक्तस्राव की वजह से उसका बीपी काफी कम हो गया और किडनी पर असर पड़ा। कम रक्तचाप के कारण दोनों किडनी फेल हो गईं और डायलिसिस की स्थिति बन गई,इसलिए उसे महात्मा गांधी हॉस्पिटल की आईसीयू में शिफ्ट किया गया।
आईसीयू इंचार्ज डॉ. शिखा सोनी ने बताया कि
आईसीयू में आने के बाद मरीज का 4 से 5 बार डायलिसिस किया गया। 10-15 दिन डायलिसिस द्वारा फिल्ट्रेशन के बाद किडनियां थोड़ा-बहुत काम करने लगीं,परंतु तब तक आंतों ने जवाब दे दिया। किडनी फेल्योर से शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया इकट्ठा होने तथा ऑपरेशन के दौरान हैंडलिंग की वजह से आंतें पैरालिसिस में चली गईं और मोबिलिटी बिल्कुल बंद हो गई। खाना पास नहीं हो रहा था,आंतें जाम हो गईं,पेट में दबाव बढ़ने से फेफड़ों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी और मरीज को वेंटिलेटर पर लेना पड़ा।
दुर्भाग्य से मरीज की सांस की नली सामान्य से 50 प्रतिशत संकरी थी। सामान्य मरीज को जहां 7 या 8 नंबर की ट्यूब लगती है,इसमें 6 नंबर की ट्यूब भी बड़ी मुश्किल से गई। बहुत ही क्रिटिकल तरीके से सांस की नली डालकर वेंटिलेटर पर लेकर जान बचाई गई।
10 दिनों तक मरीज को इंजेक्शन द्वारा पोषण दिया गया,पर आंतों में मोबिलिटी नहीं आई। फिर एक रेयर ट्रीटमेंट- इंजेक्शन नियोस्टिग्मीन से आंतों को स्टीमुलेट किया गया और थोड़ी- बहुत मोबिलिटी आई। डेडलॉक टूटते ही आंतों ने धीरे-धीरे काम शुरू किया।
फेफड़े अभी भी पूरी तरह काम नहीं कर रहे थे। अगले 10 दिन मरीज वेंटिलेटर पर रही। सांस का रास्ता संकरा होने के कारण गले में परक्यूटेनियस तकनीक से ट्रैकियोस्टॉमी कर छेद बनाकर वहां से वेंटिलेटर द्वारा सांस दी गई। जब आंतें नॉर्मल हुईं तो ट्रैकियोस्टॉमी के साथ ही मुंह से खाना-पीना शुरू किया गया। जैसे-जैसे आंतों का फंक्शन सामान्य हुआ,फेफड़े भी नॉर्मल हुए,तब गले से सांस की नली निकाली गई और धीरे-धीरे सारे लाइफ सपोर्ट हटाए गए।
अधीक्षक डॉ.फतेह सिंह भाटी ने बताया कि 40 दिनों तक की क्रूशियल क्लोज मॉनिटरिंग और कई तरह के इंटरवेंशन्स के बाद मरीज आज पूरी तरह स्वस्थ है। वह अपने पैरों पर चलकर वॉशरूम जा रही है,आईसीयू में घूम पा रही है और आज स्वस्थ स्थिति में घर भेजा गया है।
प्राचार्य डॉ.बीएस जोधा ने एमजीएच आईसीयू की पूरी टीम-एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष डॉ.राकेश कर्नावट,आईसीयू इंचार्ज डॉ.शिखा सोनी,नर्सिंग प्रभारी बीनू,समस्त रेजीडेंट तथा नर्सिंग स्टाफ को साधुवाद दिया। उन्होंने कहा कि आईसीयू की टीम दिन-रात अथक प्रयास करती है और ऐसे मरीज का ठीक होकर घर जाना बाकी मरीजों और स्टाफ में उम्मीद जगाता है।
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उषा के मामले में सामान्य सिजेरियन से अलग 5 बड़ी समस्याएं थीं
1-लो हीमोग्लोबिन: प्रसव पूर्व ही हीमोग्लोबिन कम था,थोड़े से रक्तस्राव में ही बीपी और हीमोग्लोबिन गिरा,किडनी पर स्ट्रेस आया और दोनों किडनी फेल हो गईं।
2-एक्यूट किडनी इंजरी: दोनों किडनी फेल होने के बाद कई डायलिसिस हुए, फिर धीरे-धीरे किडनियां सामान्य होने लगीं।
3-पोस्ट ऑपरेटिव पैरालिटिक इलियस: ऑपरेशन के बाद आंतें शिथिल पड़ गईं, मोबिलिटी खत्म हो गई, खाना-पानी आगे पास नहीं हुआ,पेट फूलने लगा। किडनी कम काम करने से क्रिएटिनिन- यूरिया के कारण स्थिति और बिगड़ी।
4-सुप्राग्लॉटिक लैरेंजियल स्टेनोसिस (संकरी श्वास नली):
श्वास नली काफी संकरी थी,6 नंबर की ट्यूब भी मुश्किल से गई,इसलिए वेंटिलेटर पर लेना और हटाना दोनों रिस्की था।
5-एआरडीएस (एडल्ट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम):
लंबे समय तक आईसीयू में रहने से वेंटिलेटर एक्वायर्ड निमोनिया डेवलप हो गया,जो मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट था। हाई-एंड एंटीबायोटिक्स से इलाज किया गया। पैरालिटिक इलियस से पेट का दबाव और संकरी सांस नली ने स्थिति को और गंभीर बनाया।
डॉ.शिखा सोनी ने बताया कि कई बार लगा कि मरीज को खो दिया है, इतनी क्रिटिकल स्थिति से वापस आना मुश्किल था, पर उषा अपनी विल पावर और अपने भाई व पति के अथाह प्रयासों से आज पूरी तरह स्वस्थ है।
उषा का संपूर्ण इलाज जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत महात्मा गांधी हॉस्पिटल में किया गया।
