टूट रहे संयुक्त परिवार, विरूपित होते लोक संस्कार
सनातन संस्कृति-1
टूट रहे संयुक्त परिवार, विरूपित होते लोक संस्कार,विषय को लेकर लेखक ने सनातन संस्कृति और संयुक्त परिवार की सार्थक विवेचना की है। पाठकों के लिए यह लेख किस्तों में प्रकाशित किया जा रहा है। इसे आप भी पढ़िए और नई पीढ़ी को भी पढ़ाईए। आज प्रथम
किस्त पढ़िए।
सनातन संस्कृति में परिवार को समाज की मूल इकाई और संस्कारों की प्रथम पाठशाला माना गया है। यह केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं,बल्कि प्रेम, त्याग,अनुशासन,मर्यादा और कर्तव्य जैसे जीवन मूल्यों का जीवंत केंद्र है। भारतीय परंपरा में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना परिवार से ही विकसित होकर समाज और विश्व तक पहुँचती है। परिवार ही वह स्थान है जहाँ व्यक्ति जीवन जीने की कला,बड़ों का सम्मान,छोटे का स्नेह और सामूहिक उत्तरदायित्व सीखता है। बदलते समय में जब व्यक्तिवाद और भौतिकता का प्रभाव बढ़ रहा है,तब परिवार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि परिवार सुदृढ़ रहेगा,तो संस्कृति भी सुरक्षित और समृद्ध बनी रहेगी; क्योंकि संस्कारों का संचार सबसे पहले और सबसे प्रभावी रूप से परिवार में ही होता है।
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सनातन संस्कृति में परिवार को ‘गृहस्थाश्रम’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है,जो चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास,में सबसे अधिक सक्रिय और केंद्रबिंदु माना गया है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में परिवार को ‘धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष’ की साधना का आधार कहा गया है।
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परिवार-संस्कारों की प्रथम पाठशाला
मनुष्य के जीवन की पहली शिक्षा परिवार से प्रारंभ होती है। माता-पिता, दादा- दादी और अन्य परिजन मिलकर बालक के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। बोलना,चलना,व्यवहार करना,बड़ों का सम्मान, छोटों से स्नेह ये सभी गुण परिवार में ही विकसित होते हैं।यही वह स्थान है जहाँ ‘संस्कार’जीवन का अंग बनते हैं,केवल उपदेश नहीं। संस्कार ही व्यक्ति को मनुष्य से ‘श्रेष्ठ मनुष्य’ बनाते हैं। यदि परिवार में सत्य,अहिंसा,करुणा,सेवा और त्याग जैसे गुणों का वातावरण हो,तो वही गुण बालक के स्वभाव में स्थायी रूप से स्थापित हो जाते हैं।
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गृहस्थाश्रम-समाज का केंद्रबिंदु
सनातन व्यवस्था में गृहस्थाश्रम को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है,क्योंकि यही आश्रम अन्य तीन आश्रमों का पोषण करता है। गृहस्थ ही अर्थार्जन करता है,यज्ञ करता है,दान देता है और समाज के विभिन्न वर्गों का पालन करता है। गृहस्थ जीवन केवल भौतिक सुखों का साधन नहीं,बल्कि कर्तव्य,संयम और धर्मपालन का मार्ग है। इसमें व्यक्ति अपने परिवार के साथ-साथ समाज के प्रति भी उत्तरदायित्व निभाता है। इस प्रकार परिवार केवल निजी संस्था नहीं,बल्कि सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार है।
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भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा का केंद्र
परिवार व्यक्ति को केवल भौतिक सुविधाएँ ही नहीं देता,बल्कि मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा भी प्रदान करता है। जीवन में आने वाली कठिनाइयों, असफलताओं और तनावों के समय परिवार ही वह आश्रय होता है जहाँ व्यक्ति को स्नेह,सहानुभूति और समर्थन मिलता है। एक सुदृढ़ परिवार व्यक्ति को आत्मविश्वास देता है और उसे समाज में सकारात्मक योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि जिन समाजों में परिवार मजबूत होते हैं,वे समाज अधिक स्थिर और समृद्ध होते हैं।
परंपराओं और संस्कृति का संवाहक
सनातन संस्कृति की निरंतरता का सबसे बड़ा माध्यम परिवार ही है। त्योहार,व्रत,पूजा-पद्धति, लोकाचार,भाषा और रीति-रिवाज ये सभी परिवार के माध्यम से पीढ़ी- दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। दीपावली पर दीप जलाना,नवरात्रि में व्रत रखना,संक्रांति पर दान करना,ये केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं,बल्कि सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। परिवार इन परंपराओं को जीवित रखता है और आने वाली पीढ़ियों को उनसे जोड़ता है।
मर्यादा-परिवार की आत्मा
रामचरितमानस में माता अनुसूया द्वारा माता सीता को दिए गए उपदेश पारिवारिक मर्यादा और गृहस्थ जीवन की गरिमा को स्पष्ट करते हैं। वे बताती हैं कि धैर्य,धर्म,निष्ठा और कर्तव्य ही परिवार की स्थिरता के आधार हैं- ‘धीरज धरम मित्र अरु नारी,आपद काल परखिए चारी।’ इसी प्रकार नारी- धर्म के माध्यम से वे यह संदेश देती हैं कि परिवार में परस्पर सम्मान,समर्पण और मर्यादा का पालन ही सुख और संतुलन का मूल है। ये शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि परिवार की मजबूती केवल अधिकारों से नहीं,बल्कि कर्तव्यों और मर्यादाओं के पालन से सुनिश्चित होती है। परिवार की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ‘मर्यादा’ होती है। मर्यादा का अर्थ है-सीमाओं का पालन,अनुशासन और परस्पर सम्मान। यदि परिवार में मर्यादा का पालन होता है,तो वहाँ प्रेम और संतुलन बना रहता है। किन्तु मर्यादा के अभाव में परिवार टूटने लगता है और समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होती है। रामायण में भी मर्यादा का विशेष महत्व बताया गया है। वनवास के समय माता सीता को सती अनुसूया द्वारा दिए गए उपदेश इस बात का प्रमाण हैं कि नारी,पुरुष और परिवार,तीनों के लिए मर्यादा का पालन अनिवार्य है। क्रमशः
