अभाव में जीवन का आनंद
पार्थसारथि थपलियाल
अभाव,सामान्यतः जीवन की कमी या वंचना का बोध कराता है,किंतु गहन दृष्टि से देखा जाए तो यही अभाव जीवन के वास्तविक सौंदर्य को प्रकट करने का माध्यम बन जाता है। समृद्धि प्रायः मनुष्य को सहज उपलब्धियों के प्रति उदासीन बना देती है,जबकि अभाव उसे प्रत्येक छोटे सुख का मूल्य समझने की संवेदनशीलता प्रदान करता है। जब साधन सीमित होते हैं,तब कल्पना,परिश्रम और धैर्य का विकास होता है। यही गुण जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं।
अभाव मनुष्य को आत्मावलोकन की ओर प्रेरित करता है। वह बाह्य आकर्षणों से हटकर आंतरिक शक्तियों का अन्वेषण करता है। इतिहास साक्षी है कि अनेक महान व्यक्तित्व अभावों की भूमि से ही उभरे हैं;उनके संघर्ष ने ही उनके चरित्र को गढ़ा और जीवन को गरिमा प्रदान की। अभाव व्यक्ति में करुणा,सहानुभूति और सामाजिक संवेदनशीलता का भी विकास करता है,जिससे वह दूसरों के दुःख को समझने में सक्षम होता है। धनाढ्य लोग सुख खरीद सकते हैं आनंद नहीं।
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अभाव केवल कमी नहीं,बल्कि एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति है,जो मनुष्य के भीतर छिपे सौंदर्य, सामर्थ्य और मानवीय मूल्यों को उजागर करती है। इसी दृष्टि से अभाव,जीवन के आनंद का एक अनिवार्य आयाम प्रतीत होता है। अभाव में पनपे जीवन के छोटे छोटे सुख के आनंद को धनाढ्य वर्ग नहीं पा सकता। ऐसे लोग उदारमन, करुणामय और सामाजिक होते हैं।
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ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो जब भी पढ़ेंगे बहुत आनंद मिलेगा। उसका मुखड़ा याद दिला रहा हूं –
ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो,भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,वो कागज कि कश्ती वो बारिश का पानी।।
