भारतीय नववर्ष: सांस्कृतिक दृष्टि

लेखक- पार्थसारथि थपलियाल

प्राचीन काल से भारत में काल गणना के अनेक आधार रहे हैं। प्राचीन अनेक राजाओं ने अपने नाम से संवत चलाये। वर्तमान में लोक व्यवहार में विक्रम संवत,शक संवत और ईस्वी सन प्रचलन में हैं। लोक जीवन में विक्रम संवत सबसे अधिक उपयोग में आता है,शक संवत को राष्ट्रीय संवत होने की मान्यता है। न्याय प्रिय,महान प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने चैत्र वर्ष प्रतिपदा के दिन राज्यारोहण किया था। निश्चय ही इस आयोजन को 2082 वर्ष पूरे हो गये।

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ब्रह्म पुराण में उल्लेख है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का प्रारंभ हुआ। मनुस्मृति तथा अन्य धर्म शास्त्रों में भी इस तिथि को काल गणना का आरंभ माना गया है। इस प्रकार,यह तिथि “सृष्टि के प्रथम दिवस” के रूप में प्रतिष्ठित है। वसंत ऋतु प्रकृति का मधुर नवोदय है। शिशिर की कठोरता के पश्चात पृथ्वी नवपल्लवों से आच्छादित हो उठती है। आम्र-मंजरियों की सुगंध, कोयल की कूक और पुष्पों की विविध छटा वातावरण को सुरभित करती है। यह ऋतु जीवन में नवचेतना,प्रेम और सृजन का संचार करती है,मानो समस्त सृष्टि आनंद के राग में झूम उठी हो।

नवरात्रि और नववर्ष का आगमन जीवन में नवचेतना,श्रद्धा और उत्साह का अद्भुत संगम लेकर आता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर आदि शक्ति की आराधना से आत्मबल,सद्गुण और धर्मनिष्ठा का संचार होता है। साथ ही,हिंदू नववर्ष नवीन संकल्पों,आशाओं और उज्ज्वल भविष्य की प्रेरणा देता है। यह कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश,आलस्य से कर्म और निराशा से आशा की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है। घर-आँगन में मंगलमय वातावरण,भक्ति और उल्लास से जीवन परिपूर्ण हो उठता है।

नवरात्रि एक वर्ष में 4 बार आती है लेकिन 2 नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है आश्विन मास और चैत्र मास की नवरात्रि को अधिक पुण्य फलदायी माना जाता है। इसलिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन भारत में नव वर्ष मनाने की परंपरा है। इस दिन से वसंत ऋतु का आरंभ होता है,जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है। सूर्य मेष संक्रांति के समीप होता है और चंद्रमा शुक्ल पक्ष में प्रवेश करता है। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा आज 19 मार्च को है।

भारत की सांस्कृतिक विविधता में नववर्ष के अनेक रूप दिखाई देते हैं,जो मूलतः एक ही तिथि या कालखंड से जुड़े हैं-उत्तर भारत में यह दिन विक्रम संवत नववर्ष के नाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को गुड़ी पड़वा कहा जाता है। घर के बाहर “गुड़ी” (ध्वज) स्थापित कर विजय और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। आंध्र प्रदेश व कर्नाटक में इस दिन को उगादी के रूप में मनाया जाता है। पंडितजी से पंचांग फल सुनने की परंपरा विशेष है। कश्मीर में इस दिन को नवरेह नाम से मनाते हैं। सिंधी समाज में झूले लाल जन्मदिन को नव वर्ष के साथ चेतीचंड के रूप में मनाते हैं।

इस दिन भोर सुबह पारंपरिक समाज में घरों में साफ सफाई की जाती है। घरों को वंदनवार से सजाया जाता है। लोग नव वस्त्र धारण करते हैं। विधि-विधान से पूजा की जाती है। लोग नव वर्ष के नव संकल्प लेते हैं। आम्रमंजरी को आशीर्वाद के रूप में लेने की परंपरा है। जरूरतमंद लोगों को अन्न -वस्तर दान किये जाते हैं। पूजा के बाद पंचांग फल श्रवण किया जाता है। अंत में मिष्ठान बांटा जाता है। यह है नव-वर्ष अभिनंदन की भारतीय परम्परा।

आप सभी को नव-वर्ष विक्रम संवत 2083 की और चैत्र नवरात्रि की शुभकामनाएं।

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