अस्थाई सेवा अवधि को सभी प्रयोजनार्थ सेवा माने जाने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),अस्थाई सेवा अवधि को सभी प्रयोजनार्थ सेवा माने जाने का आदेश। राजस्थान हाईकोर्ट ने नियमित चयन से पूर्व की अस्थायी/सविंदा अस्थाई सेवा अवधि को सभी प्रयोजनार्थ सेवा माने जाने का अहम आदेश दिया है। इसमें याचिका कर्ता नीतू चौधरी को 22 साल बाद हाईकोर्ट से न्याय मिला। याचिकाकर्ता को भारी राहत मिली है। फैसला वरिष्ठ न्यायाधीश कुलदीप माथुर की एकलपीठ द्वारा दिया गया।

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जोधपुर निवासी नीतू चौधरी,नर्सिंग ऑफिसर की ओर से अधिवक्ता यशपाल ख़िलेरी ने वर्ष 2004 में रिट याचिका पेश कर बताया था कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग,राजस्थान सरकार द्वारा रोजगार कार्यालय के जरिए और विज्ञप्ति प्रकाशित कर आवेदन पत्र आमंत्रित किये जाने के बाद गठित चयन कमेटी के द्वारा नियमित चयन प्रक्रिया का पालन करते हुए मेरिटनुसार और रोस्टर का पालन करते हुए याची का आरंभिक चयन नर्स ग्रेड द्वितीय के रिक्त स्वीकृत पदों पर 25 जनवरी 2000 को किया गया था।

तब से वह चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में लगातार कार्यरत हैं एवं आरंभिक चयन चिकित्सा विभाग में नर्सिंग अधिकारी के स्वीकृत रिक्त पदों पर किया गया था, लेकिन आरंभिक चयन के अनुसरण में महात्मा गांधी अस्पताल, जोधपुर में जॉइन करने के पश्चात चिकित्सा विभाग द्वारा सभी पदों पर संविदा आधार पर नियुक्तियां की जाने लगी,लेकिन 26 अक्टूबर 2004 को राज्य सरकार द्वारा नर्सिंग ऑफिसर व अन्य पदों पर रिटायर्ड कार्मिकों को नियुक्तियां दिए जाने के आदेश और विज्ञप्ति 11 नवंबर 2004 को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा के नियमितिकरण और समान कार्य,समान वेतन दिए जाने की गुहार लगाई गई।

जिस पर प्रारंभिक सुनवाई पश्चात अंतरिम आदेश देते हुए रिटायर्ड कार्मिकों को नियुक्तियां दिए जाने के आदेश और विज्ञप्ति 11 नवंबर 2004 के अनुसरण में की जाने वाली नियुक्तियों को रिट याचिका के निर्णयाधीन करने का आदेश दिया गया।

आज मुख्य न्यायाधीश द्वारा उच्च न्यायालय में शनिवार को किए गए कार्यदिवस के विरोध में वकीलों के स्वैच्छिक बहिष्कार किए जाने के कारण याचिकाकर्ता नीतू चौधरी स्वयं उच्च न्यायालय में उपस्थित होकर अपने मामले की पैरवी की और न्यायालय से अपने आरंभिक नियुक्ति तिथि 26 जनवरी 2000 से समस्त सेवा परिलाभ यथा सेवा गणना किये जाने, वरिष्ठता,पदोन्नति इत्यादि दिए जाने की गुहार लगाई।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया कि चिकित्सा अधीनस्थ सेवा नियम, 1965 में अस्थायी नियुक्ति का प्रावधान किया हुआ है और राजस्थान सेवा नियम, 1951 और पेंशन नियम, 1996 में अस्थायी सेवा को क्वालीफाइंग/अर्हक सेवा के लिए योग्य माना गया है।

याचिकाकर्ता ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में धर्म सिंह और जग्गो प्रकरण में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि लंबे समय तक लगातार बिना व्यवधान के कार्यरत होने पर यह माना जायेगा कि कार्मिक स्वीकृत पद पर कार्यरत हैं और वह सेवा नियमितीकरण का हकदार हैं। ऐसे में नियमितिकरण से पहले की लगातार कार्य अवधि को समस्त सेवा परिलाभ के लिए गणना किए जाने की गुहार लगाई गई।

हाईकोर्ट वरिष्ठ न्यायधिपति कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने रिट याचिका स्वीकारते हुए याचिकाकर्ताओं को सेवा निरन्तरता का लाभ देते हुए राज्य सरकार के चिकित्सा विभाग को आदेशित किया कि याचिकाकर्ता को सेवा निरन्तरता का हकदार मानते हुए पूर्व में की गई सेवा अवधि (आरंभिक नियुक्ति तिथि दिनांक 26 जनवरी 2000 से आज तक) को अर्हक सेवा अवधि में सम्मिलित करते हुए समस्त परिलाभो के लिए गणना की जाए और तदनुसार वरिष्ठता और पदोन्नति परिलाभ दिए जाए। साथ ही नियमित वेतनमान, वेतनवृद्धि एवं अन्य सभी भत्ते आरम्भिक नियुक्ति तिथि से सेवा अवधि की गणना करते हुए दिए जाएं।