इस ओवर की आख़िरी गेंद… धन्यवाद मंजुल!

इस ओवर की आख़िरी गेंद… धन्यवाद मंजुल!

स्मृति शेष—–

लेखक- पार्थसारथि थपलियाल

जोधपुर, सुप्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर मुरली मनोहर मंजुल अब हमारे बीच नही रहे। मुरली मनोहर “मंजुल” रेडियो क्रिकेट कमेंट्री के उन आरंभिक कमेंटेटर में से एक थे,जिन्होंने कमेंट्री को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया। जसदेव सिंह तब तक स्टाफ आर्टिस्ट के तौर पर कमेंटेटर के रूप में स्थापित हो चुके थे। उसी दौर में (1966 से) मुरली मनोहर “मंजुल” स्थानीय रणजी ट्रॉफी मैचों से रेडियो कमेंट्री की स्वरसाधना में लगे हुए थे। मुरली मनोहर मंजुल,सुशील दोषी और जोगा राव आठवें-नवें दशक के वे हिंदी कमेंट्रेटर थे जिन्होंने कमेंट्री को बैट बॉल के संचालन के साथ शब्दों को गति,यति,रोमांच,परिहास और दिल की धड़कनों को घटाने बढ़ाने वाले पॉज और हर्षोल्लास के शब्दों को व्यक्त करने का व्याकरण भी रचा और अंग्रेज़ी कमेंट्री के समानांतर हिंदी के शब्दों की गढ़ाई और रोपाई भी की। स्पष्ट और मखमली आवाज़ के धनी क्रिकेट कमेंटेटर मुरली मनोहर “मंजुल” हमारे बीच अब नही रहे।

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जोधपुर के कबूतरों का चौक (मोहल्ला) में मंजुल का पुस्तैनी मकान है। इसी मकान में 9 अक्टूबर 1983 को मैं पहली बार मंजुल जी से मिला था। उससे पहले मैंने केवल उनकी क्रिकेट कमेंट्री रेडियो पर सुनी थी। साल 1973 या 1974 रहा होगा (संभवतः भारत और वेस्टइंडीज के मध्य फिरोजशाह कोटला में खेला गया क्रिकेट टेस्ट मैच)। वह दौर क्रिकेट कमेंट्री का स्वर्णिम काल था। उनके घर पर जाकर उनसे मिलना मेरा अपना उद्देश्य भी था। मैं ट्रांसमिशन एक्सिक्यूटिव पद पर पदभार ग्रहण करने आकाशवाणी जोधपुर पहुँचा
था। मेरे पूर्ववर्ती साथी अशोक व्यास और मुकुल गोस्वामी से ड्यूटी रूम में मिला।अद्भुत मिलन था।उन्होंने मंजुल साहब का घर का पता बताया था। उन्हें उनके प्रिय मित्र विजय दीक्षित (सहायक निदेशक,आकाशवाणी, नजीबाबाद) का पत्र पहुंचाना था,जो मेरे पास था। मंजुल से मेरी पहली ही मुलाकात बहुत अपनत्व लिए रही। जोधपुर अपनी आवभगत और अपनायत के लिए विख्यात है। अगले दिन उन्होंने पदभार ग्रहण करवाया और स्टाफ के अन्य अधिकारियों से मेरी व्यवस्थाओं में सहयोग करने को कहा।

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अगले दिन सुबह प्रोग्राम मीटिंग में एक ट्रांसमिशन रिपोर्ट में था कि “सुपातर बीनणी”(राजस्थानी फिल्म) का गाना प्रसारित नही किया जा सका क्योंकि शेड्यूल्ड गाना-नखरलो देवरियो पर स्क्रेच डाले हुए हैं। मंजुल साहब ने दीनेश शर्मा,पैक्स से जांच कर रिपोर्ट पेश करने को कहा।सुपातर बीनणी फ़िल्म में मंजुल ने भीअभिनय किया था। किसी विघ्नसंतोषी ने उस लोकप्रिय गाने पर पिन से स्क्रेच कर दिया था। मंजुल शब्दों के सारथि थे, यह कारण था कि हास परिहास के शब्द उनके जीवन साथी रहे।

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उन दिनों आकाशवाणी,जोधपुर नवनिर्मित भवन में शिफ्ट हो चुका था। स्टूडियो ब्लॉक किसी फाइव स्टार होटल जैसे फर्नीचर,गलीचे व सजावट से अति आकर्षक लगता था। इसके पीछे मंजुल की कलात्मक सोच थी। मंजुल साहब स्टाफ के साथ बहुत ही सरल और सहज रहते थे। मुझे आकाशवाणी जोधपुर जॉइन किये हुए 34 दिन हुए थे कि मंजुल का स्थानांतरण हो गया लेकिन जब भी वे अपने घर आते उनसे यदा कदा मिलना हो जाता था।

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मंजुल अपने स्वभाव से सरल और सरस कवि थे। रूपक विधा के वे निष्णात प्रोड्यूसर थे। उनकी लिखी कई पुस्तकें “आंखों देखा हाल”और “आकाशवाणी की अन्तर्कथा” बहुत चर्चित रही हैं। आंखों देखा हाल पुस्तक को 1987 में भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था। जीवन के खेल की उनकी रेडियो यात्रा आकाशवाणी पटना से शुरू हुई जयपुर,सूरतगढ़,जोधपुर,उदयपुर, बॉम्बे आदि केंद्रों से होकर उदयपुर में पूरी हुई। जोधपुर से जाने के कुछ समय बाद वे केंद्र निदेशक हो गए थे।
25 फरवरी 2024 को उन्होंने अपने जीवन की पिच पर जयपुर में आख़िरी बॉल तक की कमेंट्री पूरी कर विश्राम लिया…धन्यवाद मंजुल! ईश्वर शब्दों के सारथि को अपनी शरण में स्थान दे ताकि देवलोक के देवता एक नए अंदाज की कमेंट्री सुन सकें।

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