20 फीसदी पेंशन राशि आजीवन रोके जाने के विभागीय दण्ड पर हाईकोर्ट खंडपीठ ने लगाई रोक
राजस्थाान हाईकोर्ट
जोधपुर(दूरदृष्टिन्यूज),20 फीसदी पेंशन राशि आजीवन रोके जाने के विभागीय दण्ड पर हाईकोर्ट खंडपीठ ने लगाई रोक। राजस्थान हाईकोर्ट ने 20 फीसदी पेंशन राशि आजीवन रोके जाने के विभागीय दण्ड पर रोक लगाई है। राजस्थान हाइकोर्ट के वरिष्ठ जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की अवकाशकालीन खंडपीठ से यह राहत मिली। अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी की।
पाली (राजस्थान) के तत्कालीन अतिरिक्त सीएमएचओ डॉ. किशन लाल मंडोरा ने अपने सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद उसकी पेंशन राशि का 20 फिसदी भाग स्थायी रूप से रोके जाने के विभागीय दण्ड को अधिवक्ता यशपाल खिलेरी के मार्फ़त रिट याचिका में चुनौती देते हुए बताया कि वर्ष 2012- 13 एवं वर्ष 2013-14 में परिवार कल्याण नसबन्दी शिविरों में आवश्यक औषधियों और कंज्यूमेबल आईटम के लेखा संधारण में लापरवाही बरतने और स्वीकृत राशि से अधिक व्यय करने के लिए उत्तरदायी मानते हुए घटना के करीब सात साल बाद 21 मई 2021 को सीसीए नियम, 1958 के नियम -16 में याचिकाकर्ता को आरोप-पत्र जारी किए।
दौरान जांच,याचिकाकर्ता के मांगने पर भी आवश्यक दस्तावेजों की कॉपियां उपलब्ध नहीं करवाई गई और सूचना के अधिकार प्रावधानों में भी नकल देने से इन्कार कर दिया गया। विभागीय जांच के दौरान अभियोजन पक्ष गवाहों ने भी याचिकाकर्ता द्वारा लापरवाही माने जाने को स्वीकार नहीं किया।
ट्रैक्टर चालक की लापरवाही ने छीनी दो जिंदगी
इसके उलट इन सभी गवाहों ने माना कि परिवार कल्याण नसबन्दी शिविरों में आवश्यक औषधियों और कंज्यूमेबल आईटम के लेखा संधारण का काम लेखा कार्मिकों एवं लेखाधिकारी का होता हैं और यह भी बयान दिया कि आवश्यक औषधीयो और कंज्यूमेबल आईटमो के अधिक खरीद कर लेने से चिकित्सा विभाग को कोई भी आर्थिक हानि एवं नुकसान नहीं हुआ है बल्कि तत्कालीन संयुक्त निदेशक डॉ युद्धवीर सिंह राठौड़ ने यह कथन किया कि परिवार कल्याण नसबन्दी शिविरों में किए जाने वाले नसबन्दी केसेज का निश्चित पूर्वानुमान लगाया जाना संभव नहीं होता है और अधिक नसबंदी ऑपरेशन हो जाने की स्थिति में अगर सामग्री व आवश्यक सामान कम पड़ जाये तो विभाग की छवि धूमिल होती हैं।
इस प्रकार अभियोजन पक्ष गवाहों के बयानों से याचिका कर्ता के विरुद्ध लगाए गए दोनों आरोप नासाबित हुए। बावजूद इसके, नया आरोप पर्यवेक्षण लापरवाही बताकर विभागीय जांच को एकतरफा तरीके से करते हुए अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अपने स्वयं के दिमाग का स्वतन्त्र उपयोग लिए बिना ही निर्दोष याचिकाकर्ता को 20 प्रतिशत पेंशन आजीवन रोके जाने के गंभीर दण्ड से दण्डित कर दिया,जो सज़ा चौंकाने वाली और लगाए गए आरोप के बनिस्पत अत्यधिक असंगत दण्ड है।
इस अनुचित दण्ड से 65 वर्षीय उम्र दराज याचिकाकर्ता को हर महीने कऱीब 40 हजार का आर्थिक नुकसान होगा। जबकि लगाए गए दोनों आरोप में ऐसा कोई भी आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार को किसी भी तरीके से कोई आर्थिक नुकसान पहुंचाया हो या कोई गबन किया हो या विभाग को कोई वित्तीय हानि पहुंचायी हो। एक स्थगन आदेश जारी करने के लिए तीनों आवश्यक घटक प्रथमद्रष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति,याचिका कर्ता के पक्ष में है लेकिन एकल पीठ द्वारा विभागीय जांच पश्चात दिए गए विभागीय दण्ड पर रोक लगाने से इंकार कर स्थगन याचिका ख़ारिज कर दी।
एकलपीठ का निर्णय
विभागीय जांच के बाद याचिकाकर्ता की पेंशन का 20 प्रतिशत भाग हमेशा के लिए रोकने का आदेश दिया गया था। इस दंड को चुनौती देने पर एकलपीठ ने यह कहते हुए अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया था कि यह अंतिम राहत देने जैसा होगा।
खंडपीठ में चुनौती
एकलपीठ के इस इनकार आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील की गई और अधिवक्ता ने तर्क दिए कि जब मूल जांच, सजा की मात्रा और दिया गया दण्ड ही विवादित है,तो आजीवन 20 फीसदी पेंशन रोकने जैसे गंभीर दंड पर विचार किए जाने की आवश्यकता है और ताफ़ैसला इस अनुचित असंगत सजा पर रोक लगाने की गुहार लगाई गई।
अपील याचिका की प्रारम्भिक सुनवाई पश्चात, अधिवक्ता के तर्कों पर मनन और रिकॉर्ड का अनुशीलन कर राजस्थान उच्च न्यायालय खंडपीठ ने माना कि रिट याचिका विभागीय जांच के निष्कर्षों,दी गई सज़ा और सज़ा की मात्रा को चुनौती देते हुए पेश की गई है और ऐसे में जांच पश्चात दिए गए सज़ा पर अंतरिम रोक लगाने का मतलब अंतिम राहत देना नहीं है। राज्य सरकार के कार्मिक विभाग और चिकित्सा विभाग प्रमुख शासन सचिव को जवाब तलब करते हुए सेवानिवृत याचिकाकर्ता की आजीवन 20 प्रतिशत पेंशन राशि रोकने की विभागीय सज़ा पर अंतरिम रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद नियत की गई।
