Halloween:  नौनिहालों को पश्चिमी सभ्यता की ओर धकेल रहें हैं भविष्य निर्माता

[विशेष लेख-आरएस थापा]

Halloween: वर्तमान में भारतीय विद्यालयों में मनाये जा रहे त्योहारों में पश्चिमी सभ्यता की झलक साफ तौर पर देखी जा सकती है। विशेषतः निजी विद्यालयों में मनाए जा रहे त्यौहारों और उत्सवों में भारतीय शैली और सभ्यता केवल औपचारिकता मात्र रह गई है। इसी के उलट पाश्चात्य देशों की सभ्यता एवं शैली को जिस प्रकार बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है इससे बच्चों के मष्तिस्क में भारतीय रीति-रिवाज,त्योहारों एवं उत्सवों की छवि धूमिल होती जा रही है।

अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह बीतते बीतते अधिकांश निजी विद्यालयों में आजकल एक पाश्चात्य आधारित आयोजन बड़ा कॉमन हो चला है जिसका नाम है “हैलोवीन” या “हैलोवीन पार्टी”। (Halloween)

ऐसे मनाया जाता है हैलोवीन

हैलोवीन पश्चिमी देशों में मनाया जाने वाला त्योहार है परन्तु वर्तमान में इसका खुमार कई देशों पर चढ़ने लगा है। हैलोवीन दिवस को आल हेलोस इवनिंग,आल हैलोवीन,आल होलोस ईव और आल सैंट्स ईव भी कहा जाता है। यह दिन सेल्टिक कैलेंडर का आखिरी दिन होता है। इसलिए सेल्टिक लोगों के बीच यह नए वर्ष की शुरूआत के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग डरावने कपड़े पहनते हैं औऱ लोगों के घर जाकर उपहार लेते हैं। (Halloween)

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हैलोवीन की शुरूआत

दरअसल हैलोवीन की शुरुआत पश्चिमी देशों में काफी पहले हो चुकी थी। फसल के मौसम में किसानों की मान्यता थी कि बुरी आत्माएं धरती पर आकर उनकी फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं।इसलिए उन्हें डराकर भगाने के लिए वे खुद डरावना रूप अख्तियार कर लेते थे। इरिश लोक कथाओं के अनुसार हेलोवीन पर जैक ओ-लैंटर्न बनाने का रिवाज है। (Halloween)

लोग खोखले कद्दू में आंख,नाक और मुंह बनाकर अंदर मोमबत्ती रखते हैं। इसके बाद इसे जमा कर दफना दिया जाता है। कई जगह लोग हैलोवीन डे के दिन पार्टी करते हैं औऱ कई तरह के खेल खेलते हैं। इस दिन सबसे ज्यादा खेले जाना वाला गेम डंकिंग या एप्पल बोबिंग है जिसे स्कॉटलैंड में डूंकिंग कहा जाता है। इसमें सेब में एक टब या पानी के बड़े बेसिन में तैरते हैं और फिर प्रतिभागियों को अपने दातों से इसे निकालना होता है। इस फेस्टिवल के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, जापान,मेक्सिको समेत कई देशों में लोग कई तरह के मेकअप व विशेष ड्रेस के साथ ‘भूत’ बनते हैं। (Halloween)

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भारतीय उत्सवों को धूमिल करता “हैलोवीन”

आधुनिक युग में हैलोवीन मौज-मस्ती और छुट्टी मनाने का अच्छा जरिया बन गया है। एक तरफ जहां अन्य देशों में भारतीय संस्कृति एवं उत्सवों को अपनाया जा रहा है वहीं हैलोवीन जैसे उत्सवों की लोकप्रियता भारतीय शहरों में बढ़ती जा रही है। पहले कुछ महानगरों में इसका आयोजन होता है परन्तु अब छोटे शहरों के विद्यालयों में भी इसका आयोजन किया जाने लगा है। (Halloween)

सोचने का विषय यह है कि पश्चिमी सभ्यता से ओत-प्रोत इन आयोजनों के उद्देश्य एवं परिणामों के विषय में अधिकांश आयोजकों को न कोई ज्ञान है और न ही वे इस विषय में सोचना जरूरी समझते हैं। सभी एक दूसरे से होड़ करते हुए भाग रहे हैं और नौनिहालों को पश्चिमी सभ्यता के उद्देश्य विहीन और अवांछनीय उत्सवों, आयोजनों एवं संस्कृति की तरफ धकेल रहे हैं। इतना ही नही इन उत्सवों का आयोजन इतने ऊँचे, एवं गम्भीर स्तर पर करवाया जा रहा है कि बच्चों के मष्तिस्क में भारतीय पारम्परिक त्योहारों एवं उत्सवों की महत्ता एवं छवि धूमिल होती जा रही है। (Halloween)

शिक्षक दिवस, गुरू पूर्णिमा, वसन्तोत्सव, गणेश चतुर्थी, दशहरा, दीपावली, होली, ओणम, पोंगल आदि दर्जनों ऐसे उत्सव हैं जो बच्चों को भारतीय संस्कृति का ज्ञान देने, गुरू की महिमा,गुरू का महत्व,माता-पिता का सम्मान,देशभक्ति हेतु प्रेरित करने इत्यादि संस्कारों के साथ-साथ अच्छा नागरिक बनने की ओर अग्रसर करते हैं परन्तु अत्यन्त चिन्तनीय विषय है कि ऐसे भारतीय त्योहारों व उत्सवों को या तो विद्यालयों में आयोजित ही नहीं किया जाता है या फिर औपचारिकता मात्र से इतिश्री कर दी जाती है। (Halloween)

इसी के विपरीत पाश्चात्य उत्सवों के ऐसे आयोजनों हेतु काफी संसाधनों को खर्च किया जा रहा है और बढ़-चढ़ कर भाग लेने हेतु विद्यार्थियों को प्रेरित किया जा रहा है जिनका न तो महत्व स्पष्ट होता है और न ही कोई सकारात्मक परिणाम।(Halloween)

आखिर क्या कमी हमारे त्योहारों व उत्सवों में रह गई और क्यों हम इस प्रकार के आयोजनों को इतना बढ़ावा दे रहे हैं? यह सोचने का समय न तो शिक्षकों को है और न ही अभिभावकों को।(Halloween)

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