दिव्यांशी का आरंग्रेत्रम 12 को

शिवम् नाट्यालय का 28वां आरंगेत्रम

जोधपुर,शिवम् नाट्यालय का 28वां आरंगेत्रम दिव्यांशी पुरोहित (पुत्री किशनगोपाल पुरोहित-अनुराधा पुरोहित) द्वारा डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में 12 जून को होगा। भरतनाट्यम् दक्षिण भारत के तमिलनाडू प्रदेश की प्रसिद्ध शैली है, जिसकी परम्परा दो हजार वर्ष पूर्व की है। नटराज के रूप में भगवान शिव ही नृत्य के शिखर माने जाते हैं। भरतनाट्यम् के आज का स्वरूप में कई शताब्दियों से नृत्य गुरूओं का योगदान है। इस नृत्य का उद्देश्य नृत्य करने वाले की आध्यात्मिक संतुष्टि व देखने वालों का अकल्पनीय अनुभव है।

दिव्यांशी ने मात्र 7 वर्ष की आयु से ही शिवम् नाट्यालय में गुरू मंजूषा सक्सेना के मार्गदर्शन में भरतनाट्यम की विधिवत शिक्षा ली। दिव्यांशी एक समर्पित शिष्या है, जिसने लगन के साथ इस कला की बारीकियों को समझा और 9 वर्ष पूरे करके जोधपुर वासियों के समक्ष आरंगेत्रम् प्रस्तुत करने जा रही है। “आरंगेत्रम्” का शाब्दिक अर्थ है मंच पर कदम रखना। यह एक स्नातक प्रदर्शन है जो एक शिष्य की कला और उत्साह का प्रदर्शन देता है। इस नृत्य प्रदर्शन से गुरु को तसल्ली और संतुष्टि होती है कि उनके शिष्य नृत्य की दुनिया में आगे बढ़ने व आने वाली कठिनाईयों का सामना करने के लिए तैयार है। यह नृत्य का पहला एकल प्रदर्शन है।

“आरंगेत्रम्” नृत्य के प्रशिक्षण की परिणति का प्रतीक है। दिव्यांशी महावीर पब्लिक स्कूल की ग्यारहवीं की छात्रा है, इसे बचपन से ही नृत्य के प्रति रूचि रही है और इसके अतिरिक्त वह पेंटिंग, स्केचिंग व ड्रॉईंग में भी निपुण है। मात्र 4 वर्ष की आयु में दिव्यांशी का भरतनाट्यम के प्रति पहली बार झुकाव दिखा जब संवित धाम में गुरु पूर्णिमा के महोत्सव पर शारदा श्रीनिवासन जो बैंगलोर की भरतनाट्यम नृत्यांगना है, उनके नृत्य को एकाग्र होकर देखा। फिर उनकी मुद्राओं को घर में दोहराने लगी। उसकी इस रूचि को देखकर गुरू की खोज शुरू हुई। तब खोजबीन करने पर गुरू मंजूषा सक्सेना से मुलाकात हुई और एक सही गुरू की तलाश पूर्ण हुई और आज उन्ही गुरू की असीम कृपा से दिव्यांशी इस मुकाम पर पहुँच पाई है।

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