राजनीति के खेल की बेल में उलझा बजट सत्र

आलेख – पार्थसारथि थपलियाल

भारत में संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच माना गया है,जहाँ जनता की आकांक्षाएँ,नीतियाँ और राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ बहस के माध्यम से आकार लेती हैं। विशेषकर बजट सत्र का महत्व इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि इसमें देश की आर्थिक दिशा, विकास योजनाएँ और जनकल्याण से जुड़े प्रस्ताव रखे जाते हैं। परंतु बजट सत्र 2026 के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया,उसने संसदीय मर्यादा और राष्ट्रीय हित दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

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सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम. एम.नरवणे की संस्मरणों की अप्रकाशित पुस्तक से ऐसे विषय को उठाया जिसका प्रत्यक्ष संबंध बजट से नहीं था। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि जिस पुस्तक का उल्लेख किया जा रहा है,उसे अभी तक प्रकाशित करने की अनुमति मंत्रालय द्वारा नहीं दी गई है। इसके बावजूद विवाद थमने के बजाय और गहरा गया। अगले दिन 4 फरवरी को भी लोकसभा में हंगामा चलता रहा। विपक्ष की महिला सांसदों ने बैनर लेकर प्रधानमंत्री की सीट को घेर लिया। यह दृश्य न केवल संसदीय परंपराओं के विपरीत था,बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को सड़क-शैली के प्रदर्शन में बदलने का संकेत भी देता था।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने “अप्रत्याशित अप्रिय घटना” की आशंका के आधार पर प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान सदन में न आने का आग्रह किया। यह स्वयं में असाधारण घटना थी, क्योंकि प्रधानमंत्री का सदन में उपस्थित रहना सामान्य संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। इसके अगले दिन 5 फरवरी को अपनी सरकार की ओर से राष्ट्रपति के बजट अभिभाषण पर प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में तीखा और विस्तृत वक्तव्य दिया। फलस्वरूप लोकसभा में पिछले पाँच-छह दिनों से गतिरोध बना हुआ है और विधायी कार्य ठप पड़े हैं। संसद की कार्यवाही न चलने देना बचकानी रार प्रतीत होती है। सांसद जनप्रतिनिधि होते हैं। संसद की स्थिति को समझें तो इस सत्र में लोकहित के मुद्दों को जगह नहीं मिल पायी।

इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंता जनक पहलू राष्ट्रीय धन और समय का जमकर अपव्यय हो रहा है। संसद का प्रत्येक कार्यदिवस करोड़ों रुपये के व्यय से जुड़ा होता है। जब सदन चलता नहीं,तो यह धन बिना किसी ठोस परिणाम के नष्ट होता है। इससे भी अधिक मूल्यवान वह समय है,जिसमें देश की जनसमस्याओं, महँगाई,रोजगार,सुरक्षा,विकास,सरकार द्वारा यूरोपीय यूनियन देशों से,अमेरिका और मलेशिया से किये गये समझौतों पर चर्चा हो सकती थी। राजनीतिक दलों द्वारा दलीय हितों को प्राथमिकता देना और संसदीय दायित्वों की अनदेखी करना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

संसद बहस और असहमति का मंच अवश्य है, परंतु उसका उद्देश्य समाधान निकालना है,अवरोध खड़ा करना नहीं। विरोध की परंपरा संसदीय संस्कृति का हिस्सा है, किंतु वह नियमों और मर्यादाओं के भीतर रहकर ही प्रभावी हो सकती है। जब सदन प्रदर्शन स्थल बन जाता है,तब नीति-निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है और जनता के विश्वास को ठेस पहुँचती है। वर्तमान बजट सत्र राजनीति के खेल की बेल में उलझा हुआ है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी दल आत्ममंथन करें।

राष्ट्रीय हित को दलीय राजनीति से ऊपर रखा जाए। संसद में उठाए जाने वाले मुद्दों का संबंध कार्यसूची से हो और असहमति को संवाद के माध्यम से व्यक्त किया जाए। अन्यथा लोकतंत्र का यह मंदिर केवल शोर और ठहराव का प्रतीक बनकर रह जाएगा। राष्ट्रीय धन और समय का ऐसा दुरुपयोग न तो संविधान की भावना के अनुकूल है और न ही जनता की अपेक्षाओं के।

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