विभाजन की त्रासदी की प्रत्यक्षदर्शी ‘आमा’ ने मनाया 91वां जन्मदिन
–दया जोशी,हल्द्वानी
12 साल की उम्र में 1947 में लाहौर में खून-खराबा, आगजनी और चीखें अपनी आंखों से देखीं। जान बचाने के लिए सैन्य विमान से लाहौर से आगरा लाई गईं। आज 91 साल की उम्र में भी वह मंजर याद कर सिहर उठती हैं। यह कहानी है हल्द्वानी की हंसा मेहरा की,जिन्हें सब प्यार से ‘आमा’ कहते हैं।
1935 में अल्मोड़ा जिले के शीतलाखेत के पास बड़गल रौतेला गांव में सूबेदार गंगा सिंह रौतेला और शारदा देवी के घर जन्मी हंसा की प्राथमिक शिक्षा गांव में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वह अपने चाचा ब्रिगेडियर गोविंद सिंह के साथ रहने लगीं,जो तब कर्नल थे और विभाजन के समय लाहौर में तैनात थे।
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आमा बताती हैं, “14 अगस्त 1947 की आधी रात से जो खून-खराबा शुरू हुआ,वह दिल दहला देने वाला था। जिंदा बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। लग रहा था किसी भी पल दंगाई हत्या कर देंगे।”
ईश्वर की कृपा से परिवार को सैन्य विमान से लाहौर से आगरा लाया गया। इस विमान में पहाड़ी मूल के कई अन्य परिवारों की भी जान बची। आगरा से सड़क मार्ग से दिल्ली पहुंचे,लेकिन दहशत महीनों तक पीछा करती रही।
1952 में 17 साल की उम्र में उनका विवाह भीमताल के मेहरा गांव निवासी जमींदार ठाकुर सिंह मेहरा से हुआ। पांच संतानों में से दो पुत्रियां और एक पुत्र का देहांत हो चुका है। ज्येष्ठ पुत्र नरेंद्र सिंह मेहरा और यशवंत सिंह मेहरा पुश्तैनी घर में साथ रहते हैं। नरेंद्र अपनी प्राकृतिक खेती और नवाचारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाते हैं। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.तेज प्रताप ने उन्हें किसान मेले में मुख्य अतिथि बनाकर उनकी मां हंसा को भी सम्मानित किया था।
कभी केक संस्कृति की विरोधी रही आमा ने इस बार खुद पोते-पोतियों से केक कटवाकर 91वां जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई,जो विभाजन की पीड़ा से जिजीविषा तक के सफर का प्रतीक बन गया।
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