दो दशक पुराने मामले में मकान मालिक को दी राहत
किराऐदारी को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),दो दशक पुराने मामले में मकान मालिक को दी राहत। राजस्थान हाईकोर्ट ने किरायेदारी और दुकान खाली कराने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पिता या भाई के साथ पारिवारिक कारोबार में काम कर रहा है, तो केवल इस आधार पर उसकी स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक और सद्भाविक आवश्यकता को खारिज नहीं किया जा सकता।
इसी के साथ जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने भारत कुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए किराया अधिकरण, जोधपुर मेट्रो के 27 मई 2011 के आदेश और अपीलीय किराया अधिकरण के 22 मई 2015 के आदेश को निरस्त करने का आदेश दिया। दोनों अधीनस्थ अधिकरणों ने मकान मालिकों की बेदखली याचिका खारिज कर दी थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के पास आजीविका का मौजूदा साधन होना और उसके पास अपना स्वतंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठान उपलब्ध होना दो अलग- अलग बातें हैं। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान व्यक्ति से बेरोजगार रहने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। पारिवारिक कारोबार में काम करना स्वतंत्र व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक आवश्यकता के रास्ते में स्वत: बाधा नहीं है।
न्यायिक कार्यवाही में होने वाली देरी के कारण किसी मकान मालिक को अपनी आजीविका और व्यावसायिक आकांक्षाओं को अनिश्चितकाल तक रोककर रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।यह है पूरा मामला
मामला जोधपुर के रेलवे स्टेशन रोड स्थित एक किराये की दुकान से जुड़ा है। याचिकाकर्ता भारत कुमार और उनकी पत्नी चंद्रा दुकान के मालिक एवं मकान मालिक थे।
उन्होंने राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 की धारा 9 के तहत किरायेदारों को बेदखल करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।मकान मालिकों का कहना था कि उन्हें सिलाई मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, उपहार सामग्री और संबंधित वस्तुओं का अपना कारोबार शुरू करने के लिए विवादित दुकान की वास्तविक एवं सद्भाविक आवश्यकता है। उनका यह भी कहना था कि किरायेदार अन्य परिसरों से अपना कारोबार संचालित कर रहे हैं।
हालांकि,किराया अधिकरण ने 27 मई 2011 को बेदखली याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मकान मालिकों ने अपील दायर की,लेकिन अपीलीय किराया अधिकरण ने भी 22 मई 2015 को अपील खारिज करते हुए पूर्व आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद दोनों आदेशों को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि निचले अधिकरण ने इस तथ्य को प्रमुख आधार बनाया था कि भारत कुमार याचिका दायर करने से पहले और मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अपने पिता के साथ दूसरी दुकान में कारोबार कर रहे थे। इसी आधार पर उनकी स्वतंत्र दुकान की आवश्यकता को वास्तविक नहीं माना गया था।
जस्टिस फरजंद अली ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए कहा कि पिता के साथ काम करना इस बात का प्रमाण नहीं है कि संबंधित व्यक्ति के पास अपना स्वतंत्र और उपयुक्त व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी उपलब्ध है। कोई व्यक्ति अपने पिता या भाई के कारोबार में काम करते हुए अनुभव प्राप्त कर सकता है और साथ ही अपना अलग व्यवसाय स्थापित करने की वास्तविक इच्छा भी रख सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित दुकान के संबंध में याचिकाकर्ता का पारिवारिक कारोबार से जुड़ाव और दुकान पर सह-स्वामित्व का दावा, अपने आप में,विवादित दुकान की स्वतंत्र व्यावसायिक आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।
