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वैचारिक युद्ध और सोशल मीडिया

पार्थसारथि थपलियाल

सोशल मीडिया के वर्तमान दौर में विचारों का प्रसार अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। अनेक प्रकार के विचार, सूचनाएँ और धारणाएँ कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं। इनके प्रसार के पीछे विभिन्न उद्देश्य होते हैं-कभी लोकप्रियता प्राप्त करना, कभी आर्थिक लाभ अर्जित करना और कभी समाज या राष्ट्र के विरुद्ध दुष्प्रचार फैलाना।

आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है,बल्कि वैचारिक युद्ध का एक प्रभावशाली उपकरण बन चुका है। अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करने तथा सांस्कृतिक मूल्यों को प्रभावित करने के लिए इसका योजनाबद्ध उपयोग किया जा रहा है।

इसी विषय पर पंचनद शोध संस्थान द्वारा 17 जून 2026 को हरियाणा भवन, नई दिल्ली में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था- “वैचारिक युद्ध और सोशल मीडिया”।इसकी अध्यक्षता प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय सह- संयोजक विनय दीक्षित ने की तथा विषय प्रस्तुति प्रज्ञान सॉल्यूशन्स एवं रीतम डिजिटल फाउंडेशन के निदेशक लोकेश शर्मा ने दी। कार्यक्रम में पंचनद दिल्ली प्रांत के अनेक प्रबुद्ध सदस्य उपस्थित थे।
प्रारंभ में दिल्ली प्रांत के अतिरिक्त समन्वयक अमरेंद्र आर्य ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत की।

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इसके पश्चात दिल्ली प्रांत के समन्वयक रोहित वासवानी ने पंचनद शोध संस्थान के उद्देश्यों और उसकी गतिविधियों का परिचय कराया। अपने व्याख्यान में लोकेश शर्मा ने बताया कि भारत में लगभग 100 करोड़ मोबाइल फोन उपभोक्ता हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है,किंतु इनके माध्यम से नैरेटिव अर्थात वैचारिक मंतव्य स्थापित करने के प्रयास भी तेजी से बढ़े हैं।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का उपयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार से हो रहा है। अनेक बार योजनाबद्ध ढंग से ऐसे अभियान चलाए जाते हैं, जिनका उद्देश्य समाज और राष्ट्र के बारे में विशेष धारणा बनाना होता है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम की जीवनशैली और चिंतन पद्धति भारतीय दृष्टि से भिन्न है। भारतीय संस्कृति में वाणी को उत्तरदायित्व से जोड़ा गया है। झूठ, चुगली और समाजविरोधी आचरण को सदैव अनुचित माना गया है। किंतु जब भारतीय जीवन मूल्यों को पिछड़ा या दकियानूसी बताकर नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया जाता है,तब सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर युवा अपनी धारणाएँ निर्मित करने लगते हैं।

लोकेश शर्मा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली ने पारिवारिक संवाद को प्रभावित किया है। संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया है। दादा-दादी,नाना-नानी और अन्य पारिवारिक संबंध अब सीमित होते जा रहे हैं। बच्चों के हाथों में कम उम्र में ही मोबाइल फोन आ जाते हैं और वे बिना किसी मार्गदर्शन के विविध प्रकार की सामग्री देखते रहते हैं। परिणामस्वरूप उनके विचारों और व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मोबाइल फोन को आधुनिक युग का “द्रोणाचार्य” बताते हुए कहा कि आज बच्चों की शिक्षा और संस्कारों पर इसका प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है।

व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सोशल मीडिया पर पहचान और प्रभाव की एक अलग ही प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) भी समाज को प्रभावित कर रही है। उन्होंने कहा कि AI उपयोगी साधन है,किंतु यह उपलब्ध आंकड़ों और सूचनाओं पर आधारित होती है तथा कई बार त्रुटिपूर्ण जानकारी भी प्रस्तुत कर सकती है। इसलिए इसके उपयोग में विवेक आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ने की आदत में कमी आई है, जबकि भारतीय संस्कृति में ज्ञान और अध्ययन को विशेष महत्व दिया गया है। भारत के पास मानवता के कल्याण हेतु समृद्ध ज्ञान परंपरा है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता है। उन्होंने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार भारत के संबंध में ऐसी धारणाएँ प्रस्तुत की जाती हैं जिन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार नेपाल और बांग्लादेश की राजनीतिक घटनाओं से लेकर भारत में हुए कुछ आंदोलनों तक,सोशल मीडिया की भूमिका और उसके प्रभाव को समझना आवश्यक है। लोकेश शर्मा ने कहा कि आज भी लोग तथ्यपरक सामग्री को पसंद करते हैं और समाज को नैरेटिव तथा तथ्य के अंतर को समझने की आवश्यकता है।

जिज्ञासा सत्र में अनेक विचार सामने आए। एक सुझाव यह भी था कि जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों पर उपवास रखा जाता है, उसी प्रकार समय-समय पर “डिजिटल फास्ट” भी रखा जाना चाहिए, जिससे व्यक्ति स्वयं और परिवार के साथ अधिक समय व्यतीत कर सके।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विनय दीक्षित ने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और तकनीक से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उसके पीछे निहित वैचारिक मंतव्यों को समझें।

उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता यह है कि वह अपने पूर्वजों के अनुभवों और ज्ञान से सीखता है। तुलसीदास ने अपने समय में लोकमाध्यमों का उपयोग करते हुए रामकथा को जन-जन तक पहुँचाया। आज सोशल मीडिया के युग में भी हमें यह विचार करना चाहिए कि हम क्या पढ़ रहे हैं, क्या लिख रहे हैं और कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

कार्यक्रम के अंत में पंचनद दिल्ली प्रांत के सह- समन्वयक कुमार अमिताभ ने सभी उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी का निष्कर्ष यही रहा कि सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक से विमुख होने की नहीं, बल्कि उनके विवेकपूर्ण, उत्तरदायी और राष्ट्रहितकारी उपयोग की आवश्यकता है।