एनडीपीएस मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
केवल सह-अभियुक्त के पुलिस पूछताछ में दिए गए बयान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई जारी नहीं रखी जा सकती
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),एनडीपीएस मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला। राजस्थान हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में यह स्पष्ट किया है कि केवल सह-अभियुक्त के पुलिस पूछताछ में दिए गए बयान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती। अदालत ने कहा कि यदि आरोपी के खिलाफ कोई स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी जांच और कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानी जाएगी।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह आदेश एकलपीठ आपराधिक विविध याचिका संख्या 2773/ 2025 जीतेन्द्र सिंह बनाम राजस्थान राज्य में पारित किया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रजाक खान हैदर ने उसके खिलाफ संस्थित आपराधिक कार्रवाई को चुनौती कहा कि पुलिस थाना धमोतर,जिला प्रतापगढ़ में दर्ज स्नढ्ढक्र नंबर 76/2019 के अनुसार 25 मई 2019 को पुलिस ने गश्त के दौरान एक स्कॉर्पियो वाहन को रोकने का प्रयास किया, लेकिन चालक वाहन लेकर भागने लगा। पीछा करने पर वाहन सडक़ किनारे पत्थरों से टकराकर बंद हो गया और चालक मौके से फरार हो गया। तलाशी लेने पर वाहन से भारी मात्रा में डोडाचूरा बरामद हुआ।
जांच के दौरान पुलिस ने मोबाइल सिम और अन्य तथ्यों के आधार पर सह- अभियुक्त वीरमाराम को गिरफ्तार किया। बाद में वीरमाराम ने पूछताछ में कथित रूप से बताया कि डोडाचूरा याचिकाकर्ता से खरीदा गया था। मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि मुख्य सह-अभियुक्त वीरमा राम का ट्रायल पूरा होने के बाद एनडीपीएस कोर्ट, प्रतापगढ़ ने 2 सितंबर 2023 को उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस निर्णय को राज्य सरकार द्वारा चुनौती भी नहीं दी गई। इसके बावजूद आगे की जांच में एक अन्य आरोपी विष्णाराम ने पुलिस पूछताछ के दौरान याचिकाकर्ता का नाम लिया और कहा कि डोडाचूरा उसी ने उपलब्ध कराया था।
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अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। पूरा मामला केवल सह-अभियुक्त के कथित बयान पर आधारित था। पुलिस जांच में ऐसा कोई प्रत्यक्ष या पुष्टिकारक प्रमाण नहीं मिला, जो याचिकाकर्ता को अपराध से जोड़ सके। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 का दायरा केवल तथ्यों की खोज तक सीमित है और सह-अभियुक्त का पुलिस के समक्ष दिया गया बयान अपने आप में पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के चर्चित निर्णय तूफान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य सहित अन्य निर्णयों का हवाला दिया गया,जिनमें कहा गया है कि पुलिस पूछताछ में दिए गए बयान को बिना स्वतंत्र साक्ष्य के दोष सिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा-जब अभियुक्त के खिलाफ कोई स्वतंत्र और कानूनी रूप से विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं है,तब केवल सह-अभियुक्त के बयान के आधार पर जांच जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अदालत ने यह भी माना कि केवल पूछताछ में नाम आ जाने मात्र से किसी व्यक्ति को अपराध में शामिल नहीं माना जा सकता। अंतत: हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए केस नंबर 76/2019 तथा उससे संबंधित समस्त आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ता की हद तक रद्द कर दिया।
एनडीपीएस मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय
यह निर्णय एनडीपीएस मामलों में पुलिस जांच और साक्ष्य के मानकों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने पुन: स्पष्ट किया कि केवल सह-अभियुक्त का बयान पर्याप्त नहीं है, स्वतंत्र और पुष्टिकारक साक्ष्य आवश्यक है। आपराधिक न्याय प्रणाली अनुमान नहीं, प्रमाण पर आधारित होती है।
