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भारत में प्रसारण का प्रसार और स्थिति

भारत में प्रसारण का प्रसार और स्थिति

भारतीय प्रसारण दिवस- (23जुलाई)

लेखक-पार्थसारथि थपलियाल

दुनिया में पहली बार रेडियो सिग्नल सुने जाने की आधिकारिक ज्ञात तिथि 24 दिसम्बर 1906 मानी जाती है। व्यवस्थित तौर पर पहला रेडियो स्टेशन 1918 में कनाडा में स्थापित किया गया। यह समय प्रथम विश्वयुद्ध (जुलाई 1914 से नवम्बर 1918) के था। दुनिया को सूचनाएं प्राप्त करने का एक अद्भुत साधन मिल गया था। शीघ्र ही इस माध्यम का विस्तार होने लगा। भारत में भी निजी क्षेत्र में कुछ क्लबों के माध्यम से ऐसे प्रयास शुरू किए गए। आधिकारिक तौर पर 23 जुलाई 1927 को तत्कालीन वायसरॉय लार्ड इरविन ने बॉम्बे (बम्बई/मुम्बई) में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के पहले रेडियो स्टेशन का उद्घाटन किया था इसलिए भारत मे 23 जुलाई को प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का रेडियो स्टेशन 28 फरवरी1930 को बंद हो गया। 1अप्रैल1930 को उद्योग और श्रम मंत्रालय ने 2 साल के लिए प्रायोगिक तौर पर इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (ISBS) शुरू की। 1932 में प्रायोगिक प्रसारण को स्थायी कर दिया गया। मार्च 1935 में प्रसारण व्यवस्था के लिए “कंट्रोलर ऑफ ब्रॉडकास्ट” पद सृजित किया गया। उसी साल 30 अगस्त को लियोनेल फील्डेन (इंग्लैंड से) भारत में पहले प्रसारण नियंत्रक नियुक्त हुए।

लियोनेल फील्डेन को सही मायने में भारतीय प्रसारण का आदि पुरुष कहा जायेगा। भारत की रेडियो प्रसारण व्यवस्था को “ऑल इंडिया रेडियो” नाम देना उन्ही का प्रयास था जिसके लिए तत्कालीन वॉइसरॉय लिनलिथगो से इस नाम पर सहमति लेने की एक रोचक कहानी भी है। (अभी कहानी सुनाने का उपयुक्त वक्त नही।) 8 जून 1936 को ISBS के स्थान पर पहली बार श्रोताओं ने यह उद्घोषणा सुनी- This is All India Radio.

नवम्बर 1937 में ऑल इंडिया रेडियो को संचार विभाग में शामिल किया गया। 1अगस्त 1937 को Central News Organisation की स्थापना की गई। बाह्य प्रसारण सेवा के नाम पर सर्वप्रथम 1 अक्टूबर 1939 में पश्तो भाषा में प्रसारण शुरू हुआ। 24 अक्टूबर 1941 को ऑल इंडिया रेडियो को सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन किया गया। जन्म से ही यह व्यवस्था फुटबॉल बनी रही। 23 फरवरी 1946 को ऑल इंडिया रेडियो को सूचना एवं कला विभाग के अंतर्गत लाया गया। 10 सितंबर 1946 को सूचना एवं कला विभाग को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नाम दिया गया।

भारत विभाजन के समय अविभाजित भारत में 9 रेडियो स्टेशन थे। विभाजन के बाद इनमें से दिल्ली, बम्बई,मद्रास,कलकत्ता (अब कोलकाता), लखनऊ और त्रिचुरापल्ली भारत के हिस्से में आये और पेशावर, लाहौर और ढाका पाकिस्तान के हिस्से में। (ढाका अब बांग्ला देश में है।) सितंबर 1948 में सेंट्रल न्यूज़ आर्गेनाईजेशन का विभाजन दो भागों में कर दिया गया। पहला सेंट्रल न्यूज़ सर्विस डिवीजन और विदेश प्रसारण सेवा। 20 जुलाई 1950 को आकाशवाणी से पहला “संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम” प्रसारित किया गया। National Programme o Talks 23 जुलाई 1953, नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम 15 अगस्त 1956 में नियमित रूप में शुरू किए गए।

रेडियो सीलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन) के प्रति भारतीय श्रोताओं के बढ़ते व्यामोह को कम करने के लिए 3 अक्टूबर 1957 को ऑल इंडिया रेडियो को हिंदी नाम मिला “आकाशवाणी”। इसी दिन भारत की मनोरंजन प्रसारण सेवा शुरू की गई। इसे नाम दिया गया- विविध भारती। विविध भारती को पंचरंगी रूप देने वाले प्रसारण पुरुष का नाम है पंडित नरेंद्र शर्मा। ये आकशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम है- विविध भारती। अथवा आप सुन रहे हैं- विविध भारती का पंचरंगी कार्यक्रम। 1967 में 1 नवम्बर से विविध भारती से विज्ञापनों का प्रसारण शुरू किया गया। तब इसकी उद्घोषणाओं में कहा जाने लगा- विविध भारती की ये विज्ञापन प्रसारण सेवा है।

भारत में पहला F.M रेडियो 23 जुलाई 1977 में मद्रास में शुरू किया गया। पहला लोकल रेडियो स्टेशन का श्रेय नागरकोइल को जाता है। आकाशवाणी की प्राइमरी सेवा से विज्ञापनों का प्रसारण 6 जनवरी 1985 को शुरू किया गया। 18 मई 1988 को राष्ट्रीय प्रसारण के लिये अलग प्रसारण व्यवस्था शुरू की गई, जिसे प्रसार भारती ने बैंड कर दिया। इसी प्रकार 23 जुलाई 1969 में शुरू किये गए युववाणी चैनल को भी प्रसार भारती ने बंद कर दिया।

भारत मे दूरदर्शन से पहला प्रसारण 15 सितंबर 1959 में हुआ था। आरम्भ में इससे प्रायोगिक प्रसारण, कृषि प्रसारण,शैक्षणिक प्रसारण होते थे। उस समय दूरदर्शन आकाशवाणी के ही अंतर्गत था। प्रसारण भवन में ही दूरदर्शन के स्टूडियो था।आकाशवाणी के ही प्रसारक दूरदर्शन को संभालते थे। 1 अप्रैल 1976 को दूरदर्शन को आकाशवाणी से अलग कर दिया गया।

प्रसारण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है-कार्यक्रम। जिसे अंग्रेज़ी में कंटेंट कहते हैं। कंटेंट ही वह प्रसारण है जिसे लोक प्रसारण का आधार माना जाता है। इसके लिए आवश्यक है लोक प्रसारक भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, संगीत, नाटक,नृत्य,स्थापत्य कला,चित्रकला, कारीगिरी,कृषि,पशुपालन, रीति- रिवाज, लोक परंपराएं,वाक कला, लोक अभिव्यक्ति, लोक संस्कार, लोक व्यवहार, लोक संचार, लोक संवेदनाएं, आंचलिक मनोविज्ञान जैसे विषयों की अच्छी जानकारी रखता हो। समग्र भारत की समझ हो तो उत्तम है, अन्यथा क्षेत्रीय जन जीवन की जानकारी के बिना कोई भी अच्छा लोकप्रसारक नही बन सकता। निजी प्रसारकों के विस्तार के समय जब कुछ भी अभिव्यक्ति को प्रसारण की स्वतंत्रता बना दिया है तब भारतीयता को जीवित रखने के लिए लोक प्रसारण की अत्यतं आवश्यकता है।

आकाशवाणी और दूरदर्शन को स्वायत्तता देने के तत्कालीन उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1990 में प्रसार भारती अधिनियम बनाया गया। 1991 में वैश्विक अर्थव्यवस्था और नई आर्थिक नीतियों ने कई नए आयाम खोले। निजी प्रसारकों ने केबल टी वी चैनलों के माध्यम से बहुत सी प्रसारण मर्यादाओं को तोड़ना शुरू किया। राजनेताओं ने निजी चैनलों को महत्व देना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में सितंबर 1997 में प्रसार भारती को लागू करने की राजनीतिक घोषणा की गई। आनन फानन में नवम्बर 1997 में आकाशवाणी और दूरदर्शन की नियामक संस्था प्रसार भारती अस्तित्व में आई।

प्रसार भारती के संचालक जो लोग बने उनमें से अधिकतर नौकरशाह रहे। किसी व्यवस्था में हाथी जैसे आकार के बड़े लोग वैसे ही निरर्थक होते हैं जैसे कबीर दास जी ठीक कह गए- जहां काम आवे सुई कहा करत तलवार। अगर एम्स हॉस्पिटल के डायरेक्टर (चिकित्सक) का काम किसी नौकर शाह या टेक्नोक्रेट को दे दिया जाय तो वे चिकित्सकीय मर्म को समझ सकेंगे? Broadcasting केवल कम्युनिकेशन नही है। लोक प्रसारण भारत की सांस्कृतिक यात्रा की आत्मा है।

ईश्वर करे प्रसार भारती वास्तव में भारत की जनमंगल की ओर विस्तार करे। सभी प्रसारण कर्ताओं को प्रसारण दिवस पर शुभकामनाएं।

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