पिछौड़ा केवल परिधान नहीं सुहाग और संस्कृति का प्रतीक: कूर्मांचल परिषद

देहरादून(दूरदृष्टीन्यूज), उत्तराखंड में खासतौर पर कुमाऊं में पिछौड़ा सुहागिन महिलाओं के सौभाग्य का प्रतीक है। इसकी सांस्कृतिक गरिमा और पारंपरिक पहिचान बनाए रखने की अपील कूर्मांचल सांस्कृतिक कल्याण परिषद ने की है।

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परिषद ने यहां आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि पिछौड़ा केवल पहनावा नहीं,बल्कि लोकसंस्कृति, आस्था,परंपरा और नारी सम्मान का प्रतीक है। आज इसे आम परिधान बनाकर हर जगह पहना जा रहा है,जो इसकी गरिमा के खिलाफ है।

पत्रकारों को संबोधित करते हुए केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार ने बताया कि परंपरागत रूप से पिछौड़ा विवाह, नामकरण,जनेऊ, पूजा-पाठ, दीपावली, हरेला और शिव आराधना जैसे शुभ अवसरों पर धारण किया जाता है। आज कई जगह इसे फैशन के तौर पर गलत तरीके से पहना जाता है,कई बार यह जमीन तक लटकता दिखता है।

परिषद ने कहा कि पिछौड़ा चुन्नी या दुपट्टा नहीं, कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत है। इसे सम्मान और पारंपरिक तरीके से ही धारण करना चाहिए। होली पर पारंपरिक रूप से पिछौड़ा नहीं पहना जाता,क्योंकि इसमें पक्के रंग होते हैं जबकि होली पर कच्चे रंगों की परंपरा है।

परिषद का उद्देश्य नई पीढ़ी को पिछौड़े के महत्व को फैशन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पहचान के प्रतीक के रूप में समझाना है।

प्रेसवार्ता में महासचिव गोविंद पांडेय,सांस्कृतिक सचिव बबीता साह लोहनी,भारती पांडे,उमा कोठारी,शांति बिष्ट, कमला जोशी सहित कई पदाधिकारी मौजूद थे।