मेरी गढ़वाल यात्रा (3) माँ ज्वालपा धाम की ओर

लेखकपार्थसारथि थपलियाल

गाज़ियाबाद से 11 अक्टूबर की सुबह 7.50 बजे सिद्धबली जन शताब्दी एक्सप्रेस से दिन में 1.40 बजे कोटद्वार पहुंचा। यह दूरी रेलमार्ग से लगभग 230 किलोमीटर है। यात्रा में 6 घंटे 50 मिनट समय लगा। चिंतन यह चलता रहा कि यह गाड़ी किस मायने में एक्सप्रेस थी। मैने हिसाब लगाया कि एक्सप्रेस गाड़ी 60 किलोमीटर की स्पीड से भी चले तो 4 घंटे में इस दूरी को कवर कर सकती है। तुरंत याद आया न मैं रेलमंत्री न रेल का ड्राइवर। मेरी यह सोच कि नागरिक राजा होता है, निरर्थक है अन्यथा जिस दिन असली राजा (पुलिस) ने राजा (डंडा) दिखा दिया तो हड्डी पसली एक हो जाएगी। सब्र किया। कोटद्वार पहुंचते ही टैक्सी हायर की और कोटद्वार से पहाड़ों की यात्रा शुरू की। 74 किलोमीटर की ऊबड़-खाबड़ यात्रा ढाई घंटे में पूरी हुई। पहाड़ों की ठंडी हवाएं और निचले हिमालय के मनोहारी दृश्य मेरी पुरानी स्मृतियों को फीचर फिल्म की तरह मेरे सामने प्रदर्शित कर रहे थे। ये सभी विषय मुझे महाकवि कालिदास के मेघदूत में वर्णित कवि भाव -(मेघ कहीं मनोहारी दृश्यों में भटक न जाय), मुझे अपने लक्ष्य ज्वालपा देवी की ओर बढ़ना भी है और सूत कार्य भी करना है।

कोटद्वार से आगे 15 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान है “दुगड्डा”। दुगड्डा शब्द का अर्थ है- दो नदियां। दु यानी दो और गड्डा यानी गाड या नदी। यहां पर दो नदियां मिलती है। 1944 में जब अंग्रेजों के शासन काल में कोटद्वार से पौड़ी के लिए मोटरेबल सड़क बनी तब तक यह स्थान गढ़वाल की प्रमुख मंडी थी। उससे पहले कोटद्वार और उससे पहले नजीबाबाद मंडी होती थी। इन मंडियों से पहाड़ के लोगों की तीन आवश्यकताएं पूरी होती थी। नमक, कपड़ा और गुड़ ही बाजार से खरीदना होता था। लोग 150-200 किलोमीटर पैदल जाते,यह काम अधिकतर पुरूषों को करना होता था। कुछ अनाज सिर में ढोकर मंडी ले जाते जो पैसा बनता उससे सालभर के लिए नमक, कपड़ा और गुड़ खरीद कर ले जाते इस यात्रा में उन्हें 10-15 दिन लग जाते थे। उस जमाने के लोग बहुत बलशाली थे। एक आदमी 40-50 किलो बोझ उठाकर ले जा सकता था। वे लोग समूहों में चलते थे। उस जमाने में साधारण लोग जूता भी नही पहनते थे।

महाकवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम में वर्णित हस्तिनापुर (दूरी लगभग 100 किलोमीटर) का युवराज दुष्यंत और मेनका पुत्री शकुंतला की प्रणयस्थली कहूँ या अभिसारिका? आज भी युगों पुरानी प्रेमगाथा यहां के जन जीवन मे जीवित है। मालिनी नदी के तट से होते हुए कण्व ऋषि के आश्रम से आगे बढ़ते हुए दुष्यंत पुत्र भरत (जिनके नाम को भारत नाम के संदर्भ से जोड़ा जाता है) के ननिहाल से होकर मध्य हिमालय की ओर पगडंडियों से घने जंगलों से होकर जाते थे। सामान लाने की इस काम को “ढाकर” कहते थे। संभवतः ढोकर लाना ही ढाकर था।

टैक्सी ड्राइवर गढवाली था लेकिन उसे गढ़वाली बोलनी नही आती थी। उससे गढ़वाली बोली में बात करने की कोशिश की तो पता चला उसे गढ़वाली नही आती। यह हमारी आंचलिक बोलियों की दुर्दशा है। मुझे याद आया मथुरा के मेरे विद्वान मित्र रामगोपाल जी, यतीन्द्र चतुर्वेदी और श्रीकृष्ण शरद जी का जिनकी भाषा ब्रज है। ब्रज भाषा जो हिंदी की प्रमुख संघटक है आज वह बोली हो चुकी, मेरे इन मित्रों की चिंता भी गढवाली के प्रति मेरी चिंता जैसी है। दो घंटे में इन चिन्तनों के साथ नयार नदी के किनारे बसा बाजार “सतपुली” आ गया। 2008 (संवत) में यहां जबरदस्त बाढ़ आई थी, जिसमें एक रात में 22 से अधिक बसें बह गई थी।

बसों में सो रहे ड्राइवर कंडक्टर काल कवलित हो गए। उस घटना पर बना लोक गीत आज भी जीवित है- द्वी हज़ार आठ भादों क मास.. सतपुली मोटर बौगीन खास… । यहां से मेरे गाँव की दूरी 17 किलोमीटर पश्चिम दिशा में है। नयार नदी और गंगा जी का संगम व्यासघाट (देवप्रयाग से 10 मील दूर) मेरे गाँव से 6 मिल की दूरी पर पहाड़ों की तलहटी में है। मुझे सतपुली से पौड़ी की ओर यात्रा करनी है। सतपुली से ज्वालपा देवी धाम लगभग 22 किलोमीटर है। शाम के साढ़े चार बजे थे, मैं पाटीसैण होता हुआ मा ज्वालपा देवी के धाम पर था।

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क्रमशः 4