राजस्थानी भाषा की मान्यता मामले में मानवाधिकार आयोग ने लिया प्रसंज्ञान

राजस्थानी भाषा की मान्यता मामले में मानवाधिकार आयोग ने लिया प्रसंज्ञान

  • सामाजिक संगठन सत्यमेव जयते सिटीजन सोसायटी ने उठाया था मामला
  • भारत सरकार के गृह सचिव और राजस्थान के मुख्य सचिव को नोटिस भेजकर मांगी तथ्यात्मक रिपोर्ट

जोधपुर, राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मामले में राज्य मानवाधिकार आयोग ने जोधपुर के सामाजिक संगठन सत्यमेव जयते सिटिजन सोसायटी द्वारा प्रतिवेदन पेश किए जाने के बाद प्रसंज्ञान लिया है। मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष जस्टिस गोपालकृष्ण व्यास व महेश गोयल की खंडपीठ द्वारा इस मामले में प्रसंज्ञान लिया गया। यह 10 करोड़ राजस्थानियों से जुड़ा सीधा मामला है।

सामाजिक संगठन सत्यमेव जयते सिटीजन सोसायटी की अध्यक्ष विमला गट्टानी ने आयोग का आभार जताते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि अब 10 करोड़ राजस्थानी की भाषा को मान्यता मिल सकेगी। हमारी संस्था ने पिछले दिनों इसको लेकर आयोग अध्यक्ष जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास को ज्ञापन दिया था। सोसाइटी के एडवाइजरी बोर्ड के निदेशक प्रवीण मेढ और ललित सुराणा के साथ ज्ञापन दिया गया था। उसी के चलते आयोग ने प्रसंज्ञान लेते हुए भारत सरकार के गृह सचिव व राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव से इस संबंध में तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। आयोग द्वारा इस पूरे मामले की सुनवाई राजस्थान में ही की गई। यह पहला मौका है जब किसी आयोग ने इसे गंभीरता से लिया है।

गौरतलब है कि वर्ष 2003 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा भी विधानसभा से प्रस्ताव पास करते हुए केन्द्र को भेज दिया था। राज्यसभा और लोकसभा में भी इस मामले को उठा चुके हैं। पिछले 50 वर्षो से इस मसले को लेकर आंदोलन चल रहा है। परंतु केंद्र सरकार ने आज दिन तक ध्यान नहीं दिया है। आकाशवाणी से राजस्थानी में समाचार सुनाए जाते हैं, सरकार राजस्थान साहित्य अकादमी भी बनाई है, गांव के लोग राजस्थानी भाषा ही बोलते हैं अपने सुख-दुख अपनी मातृभाषा में समझा सकते हैं, देश आजाद हुए काफी वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज तक देश के संविधान में राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिली है। अपनी भाषा बोलना हर मानव का अधिकार है इसलिए केंद्र सरकार राज्य सरकार को राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के लिए निर्देश देकर राजस्थान की 10 करोड़ जनता के मानव अधिकारों की रक्षा कराएं।

आयोग का मत है कि अपने अधिकारों की रक्षा हेतु प्रार्थना अपनी भाषा में की जा सकती है। राजस्थान के गांव.गांव में अधिकांश जगह आज भी राजस्थानी बोली जाती है। गरीब जनता अपना पक्ष सिर्फ राजस्थानी भाषा में रख सकती है। राजस्थान सरकार द्वारा 25 अगस्त 2003 को संवैधानिक मान्यता का प्रस्ताव सर्वसम्मति से भी भेज दिया था। लेकिन राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं होने से उनके मानव अधिकारों का हनन हो रहा है। उपरोक्त परिस्थितियों में सचिव गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग भारत सरकार नई दिल्ली एवं मुख्य सचिव राजस्थान सरकार जयपुर को नोटिस जारी किए गए और प्रकरण के संबंध में आगामी तारीख पेशी से पूर्व आयोग से समक्ष तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया गया।

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