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आयुर्वेद के वैज्ञानिक मानकीकरण पर जोर,प्रथम दिन 3 एमओयू पर हुए हस्ताक्षर

  • आयुर्वेद विवि में अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस ‘औषध मानकम’ का राज्यपाल की अध्यक्षता में शुभारंभ
  • वैश्विक मंच पर आयुर्वेद:जोधपुर में 8 देशों के विशेषज्ञों का संगम
  • राज्यपाल एवं मंत्री जोगाराम पटेल ने किया होम्योपैथी महाविद्यालय का लोकार्पण
  • राज्यपाल बोले आयुर्वेद की दुर्लभ औषधियों एवं उनके पेटेंट की दिशा में नियंत्रण का कार्य हो
  • आयुर्वेद को वैश्विक मान्यता दिलाने का समय
  • मंत्री पटेल बोले आयुर्वेद हमारे जीवन संतुलन का विज्ञान
  • औषध मानकम’ के साथ आयुर्वेदिक औषधियों के मानकीकरण पर मंथन
  • आयुर्वेद में शोध और नवाचार को मिलेगा बढ़ावा
  • युवा शोधकर्ताओं के लिए सुनहरा अवसर
  • राज्यपाल ने विवि के इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च इन आयुष को किया लांच

जोधपुर,आयुर्वेद के वैज्ञानिक मानकीकरण पर जोर,प्रथम दिन 3 एमओयू पर हुए हस्ताक्षर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर में आज से तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस ‘औषध मानकम’ का भव्य शुभारंभ हुआ।

इस प्रतिष्ठित आयोजन की अध्यक्षता राजस्थान के राज्यपाल और कुलाधिपति हरिभाऊ बागड़े ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान के संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल थे।

विशिष्ट अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित प्रो.बीएल गौड़,गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ.एसएस. सावरीकर,एम्स जोधपुर के अध्यक्ष डॉ.एसएस अग्रवाल एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान विवि के कुलपति प्रो संजीव शर्मा ने भी इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में शिरकत की।

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इस अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में नवनिर्मित होम्योपैथिक महाविद्यालय का लोकार्पण किया गया। विवि के इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च इन आयुष को भी लांच किया गया। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि आयुर्वेद भारत की प्राचीन धरोहर है,जिसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतारना आज की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा औषध मानकीकरण के बिना आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का व्यापक प्रचार-प्रसार संभव नहीं है। यह कॉन्फ्रेंस आयुर्वेद की औषधियों को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।उन्होंने कहा कि प्रत्येक औषध का युगानुरूप सन्दर्भ में मानक होना चाहिए,उसकी ग्रेडिंग होनी चाहिए। नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान एवं आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के ग्रंथों को जला दिया गया,जिससे कुछ ज्ञान परंपरा से अद्यतन उपलब्ध नहीं हो पाया।

उन्होंने कहा हर गांव हर शहर में आयुर्वेद औषधि निर्माण के लिए उत्कृष्ट कोटि का रॉ मटेरियल मिल जाता है जो औषध निर्माण में उपयोगी है। उसकी पहचान करने की आवश्यकता है।आयुर्वेद निरापद चिकित्सा पद्धति है। तुलसी,नीम आदि के पत्तो का सेवन रोग प्रतिकार शक्ति के रूप में प्रयोग में लिया जाता है। अतः विश्वविद्यालय परिसर में अधिक से अधिक औषधीय पादपों का रोपण किया जाना चाहिए जिससे आयुर्वेद में अध्ययन करने वाले छात्र ज्ञान अर्जन कर उसकी उपयोगिता को समझकर प्रयोग में ला सकें।

उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में नियमित स्टाइपेंडरी पीएचडी का कोर्स प्रारंभ करने के लिए राजस्थान सरकार एवं राजभवन को प्रस्ताव बना कर भेजें। जिससे नियमित पी एचडी शोधार्थियों को स्टाइपेंड दिया जा सके एवं उच्च कोटि का शोध कार्य किया जा सके। उन्होंने कहा कि पत्थर कठिन होता है,परंतु पत्थर को लोहा काटता है,लोहा कठिन होता है परंतु लोहे को अग्नि पिघलाती है,अग्नि तेज होती है लेकिन अग्नि को पानी बुझाता है, अतः पानी के समान बनकर सभी को सहयोग की भावना से कार्य करने की आवश्यकता है।

संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में कहा कि आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं बल्कि हमारे जीवन के हर पहलू को संतुलित करने वाली विज्ञान है। उन्होंने आयुर्वेदिक औषधियों के मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण पर जोर देते हुए कहा कि इससे न केवल देश में,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेद की स्वीकृति बढ़ेगी। उन्होंने विवि में स्टाइपेंड आधारित नवीन पीएचडी सीट देने का भी भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय सभी विद्वतजन को साथ लेकर विश्व स्तर पर शीघ्र ही अपनी पहचान बनाएगा तथा मारवाड़ में पाए जाने वाले अर्क का पौधा ग्रामीण क्षेत्रों में बहुतायत में प्रयोग में लिया जाता है, इस पर और अधिक रिसर्च कर विभिन्न रोगों में उपयोगिता की दृष्टि से शोध कार्य किया जा सकता है।

इस अवसर पर कुलपति प्रो.(वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने राज्यपाल मंत्री,विशिष्ट अतिथिका पुष्प गुच्छ भेंटकर स्वागत अभिनंदन किया। पूर्व कुलपति प्रो गौड़ ने अपना व्याख्यान संस्कृत भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि औषधि का मानकीकरण प्राचीन समय से ही आयुर्वेदिक ग्रंथो में पूर्ण रूप से उपलब्ध है परंतु युगानुरूप में समझने की दृष्टि से इस प्रकार की कार्यशाला का आयोजन होना आवश्यक है।

इस अवसर पर एम्स जोधपुर के अध्यक्ष डॉ एसएस अग्रवाल,जाम नगर के पूर्व कुलपति डॉ एसएस सवारिकर ने विचार व्यक्त किए। इस सम्मेलन में भारत सहित 8 देशों के लगभग 500विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। भारत के 13 राज्यों से आए प्रतिनिधि आयुर्वेद औषधियों के मानकीकरण और वैज्ञानिक अनुसंधान पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे। तीन दिवसीय सम्मेलन में 260 शोधपत्रों का वाचन किया जाएगा।

कॉन्फ्रेंस के पहले दिन ही आयुर्वेदिक शोध और उद्योग क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए विभिन्न संस्थानों और संगठनों के बीच 3 एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए गए। ये एमओयू आयुर्वेद में वैज्ञानिक प्रमाणिकता और वैश्विक स्वीकृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किए गए हैं। कार्यक्रम के आयोजन अध्यक्ष प्रो.गोविन्द सहाय शुक्ल एवं उपाध्यक्ष प्रो चंदन सिंह ने बताया कि इस सम्मेलन का उद्देश्य आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।

पहले दिन विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए, जिससे प्रतिभागियों को आयुर्वेद में हो रहे नवीनतम शोध कार्यों और उनकी प्रासंगिकता को समझने का अवसर मिला। कॉन्फ्रेंस के अगले दो दिनों में और भी महत्वपूर्ण सत्र और चर्चाएं होंगी।

इस ऐतिहासिक सम्मेलन के माध्यम से आयुर्वेदिक औषधियों का भविष्य तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जाएंगे। कुलसचिव अखिलेश कुमार पीपल ने सभी मंचासीन अतिथियों, विश्व विद्यालयों के कुलपति,प्रशासनिक अधिकारियों देश-विदेश से आए हुए प्रतिभागियों, रिसोर्स पर्सन,संकाय सदस्यों, कर्मचारियो, छात्रों एवं मीडिया कर्मियों का आभार जताया।

सुश्रुत ऑडिटोरियम में आयोजित पहले सत्र की अध्यक्षता प्रो.अरुण कुमार त्रिपाठी (कुलपति,उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय) ने की। गेस्ट ऑफ़ ऑनर प्रो बीएल गौड़ थे।आयुरप्लेनेट यूके के निदेशक डॉ रघुनंदन शर्मा व डॉ जोबन किशोर मोधा डिप्टी डायरेक्टर आईटीआरए जामनगर को चेयरपर्सन थे। डॉ.रमन सिंह निदेशक पीसीआईएमएच के निदेशक ने भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी की औषधियों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में फार्माकोपिया कमीशन की भूमिका पर प्रकाश डाला। जीवनरेखा औरंगाबाद के निदेशक प्रो.एसएस सावरीकर ने खनिज और धात्विक औषधियों के विश्लेषण के महत्व पर चर्चा की।

कौंसिल फॉर आयुर्वेद रिसर्च अमेरिका की निदेशक डॉ. प्रतिभा शाह ने अमेरिका में आयुर्वेदिक उत्पादों की उपलब्धता और उपयोग पर अपना दृष्टिकोण साझा किया। दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. संजीव कुमार शर्मा (कुलपति राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर) ने की। एसोसिएशन ऑफ़ आयुर्वेद एकेडमी लंदन के निदेशक डॉ वैंकट नारायण जोशी को चेयरपर्सन थे। डॉ.सुब्रत डे ने एकल औषधियों के गुणवत्ता नियंत्रण में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की।

पूर्व विभागाध्यक्ष जाम नगर डॉ.सरशेट्टी ने रिवर्सफार्माकोलॉजिकल दृष्टिकोण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। बीएचयू के प्रो आनंद चौधरी ने हर्बो-मिनरल औषधियों के गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय पहलुओं पर जानकारी दी। जेबी रॉय कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ.प्रशांत सरकार ने गुग्गुलु उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्राकृतिक डिसइंटीग्रेंट्स के उपयोग पर विचार साझा किया।

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