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धरती की रक्षा भाव ही राष्ट्रीय चेतना के राजस्थानी साहित्य का मूल स्वर- सामौर

जोधपुर,जेएनवीयू के राजस्थानी विभाग द्वारा ऑनलाईन फेसबुक लाइव पेज पर गुमेज व्याख्यानमाला के तहत “राजस्थानी साहित्य मायं राष्ट्रीय चेतना रा सुर” विषय पर राजस्थानी भाषा के ख्यातनाम साहित्यवेता भंवर सिंह सामौर ने कहा कि धरती की रक्षा का भाव ही राष्ट्रीय चेतना के राजस्थानी साहित्य का मूल स्वर है।

राजस्थानी विभागाध्यक्ष एवं गुमेज व्याख्यानमाला की संयोजक डॉ. मीनाक्षी बोराणा ने बताया कि प्रदेश व राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार भंवरसिंह सामौर ने राष्ट्रीयता को परिभाषित करते हुए कहा कि राष्ट्रीयता सामाजिक जीवन व मानवीय जरूरतों का सामुहिक अनुभव और एक प्रबल व्यापक भाव है। राष्ट्रीय भक्ति का भाव हमारे यहां सदा से ही रहा है। मातृ भूमि पर गर्व करना हमारा स्वाभाविक गुण भी है।
सामोर ने राजस्थानी साहित्य में राष्ट्रीयता चेतना का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा का राष्ट्रीय चेतना साहित्य सम्पूर्ण भारत में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान रखता है जो वीरत्व तथा अपनी धरती, परिवेश और यहां के जन जीवन से जुड़ा समर्पित व मनुष्य के उदात भावों की अभिव्यक्ति है।

राजस्थानी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के साहित्य को तीन चरणों में विभक्त करते हुए उन्होंने बताया कि प्रथम चरण का साहित्य बर्बर आक्रांताओं के आत्याचारों से मुकाबले का प्रतिरोधी स्वर था, जिसमें गोगाजी पृथ्वीराज चौहान,अचलदास खींची,राणा प्रताप, राणा सांगा,राव जैतसी आदि की सूरवीरता और मातृभूमि के प्रति समर्पण भाव को काव्य के माध्यम से प्रकट किया। दूसरे चरण में अंग्रेजी आक्रांताओं के खिलाफ प्रतिरोधी स्वर था जो कविराजा बांकीदास, सूर्यमल्ल मिसण,शंकरदान सामौर, केसरीसिंह बारहठ आदि लोगों ने राष्ट्रीय चेतना के रूप में संचारित किया। तीसरा चरण जन आंदोलन का औजस्वी सुर था, जिसमें जयनारायण व्यास, विजय सिंह पथिक,गणेशीलाल व्यास उस्ताद, माणिक्यलाल वर्मा,हीरालाल शास्त्री, धीरज मल बछावत,कन्हैया लाल सेठिया,रेवतदान चारण, अनुज दैपावत आदि कवि थे जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे। इन्होंने राजस्थानी कविता के हथियार से राष्ट्रीय चेतना की लड़ाई लड़ी। भंवर सिहं सामौर ने राजस्थानी साहित्य में राष्ट्रीयता के स्वर की जनयात्रा पर बहुत ही विस्तार से व्याख्यान दिया और इस विषय पर शोध की महती आवश्यकता पर बल दिया।

इस ऑनलाईन व्याख्यानमाला में बड़ी संख्या में साहित्यकार,विद्ववान और शोधार्थी,विद्यार्थी जुड़े, जिसमें प्रमुख रूप से प्रो.कल्याण सिंह शेखावत, शारदा कृष्ण,घनश्यामनाथ कच्छावा, सुरेन्द्र स्वामी,डॉ.गीता सामौर,जितेन्द्र निर्मोही,महेन्द्र सिंह,रमेश जांगिड, कृष्ण सिंह राठौड़, विलमला महरिया, चन्द्रशेखर जोशी, लक्ष्मी कांत व्यास, ओम नागर,सुरेन्द्र विश्नोई,सीएम कैलाश,सैलेन्द्र सिंह,डुडा राम,प्रताप सिंह,अंजु, छैलु चारण,इन्द्रदान चारण, रणजीत सिंह पंवार,विष्णु शंकर, आदि शामिल हैं।

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