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31 साल बाद स्वास्थ्य कार्यकर्ता को मिला न्याय

जोधपुर,31 साल बाद स्वास्थ्य कार्य कर्ता को मिला न्याय।राजस्थान उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने 31 साल बाद चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता को सेवा परिलाभ दिए जाने के आदेश दिए हैं,सेवानिवृति के बाद एमपीडब्लू को न्याय मिला है। एकठ पीठ के न्यायधीश अरूण मोंगा की अदालत ने निर्णय लिया। मुख्य चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी,जोधपुर में कार्यरत रहे बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता/ एमपीडब्लू मांगीलाल शर्मा,ललित कुमार फुलवानी व 7 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट यशपाल खिलेरी और अधिवक्ता विनीता चांगल ने अलग-अलग रिट याचिकाएं दायर कर बताया कि याचीगण वर्ष 1976 से 1980  के दरम्यान नियमित चयन प्रक्रिया के पश्चात मैदानी कार्यकर्ता व सुपीरियर मैदानी कार्यकर्ता पद पर स्थायी नियुक्त हुए थे,जिनका तत्समय मुख्य काम हैज़ा,मलेरिया इत्यादि बीमारियां बाबत पूरे क्षेत्र/फील्ड में घूमकर घर घर जाकर स्लाइड लेना,आंकड़े इकठ्ठे करना और लोगों को बीमारियों के प्रति जागरूक करना इत्यादि था।

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इन पुरुष कार्मिकों का काम महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता/एएनएम के समान ही है। वर्ष 1982 में राज्य सरकार ने चिकित्सा विभाग में इन अलग नाम से पहचाने जाने वाले फील्ड पुरुष कार्मिकों का नामकरण बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता/एमपीडब्लू कर दिया गया। वर्तमान में इस पद का नामकरण स्वास्थ्य कार्यकर्ता (पुरुष) कर दिया गया है। चूंकि इन कार्मिकों को बहुत ही कम वेतन मिलता था तो राज्य सरकार ने  पुनरीक्षित वेतनमान नियम 1989 में आवश्यक संशोधन कर बहुउद्देश्यीय पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता को 10 वर्ष की सेवा पूरी होने की शर्त पर 01 सितंबर,1988 से वेतनमान 950-1680/-देने की अधिसूचना भी जारी कर दी।
बाद में समय समय पर परिपत्र भी जारी कर उक्त वेतनमान देने के स्पष्ट आदेश दिए गए लेकिन ज़िला स्तरीय अधिकारियों के हठधर्मिता और आर्थिक शोषण करने की मंशा के चलते याचीगण सहित अन्य बहुउद्देश्यीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता को उक्त वेतनमान नही दिया गया। जिस पर वर्ष 2015 में रिट याचिकाए दायर की।

हाइकोर्ट ने पहली वाली रिट याचिकाएं निर्णीत करते हुए चिकित्सा विभाग को याचीगण के प्रतिवेदन निर्णीत करने के आदेश दिए लेकिन बिना मस्तिष्क का उपयोग किये नियम विरुद्ध प्रतिवेदन ख़ारिज कर दिए। जिस पर याचीगण ने पुन: वर्ष 2015 में अलग-अलग रिट याचिका पेश की।
याचीगण के अधिवक्ता ख़िलेरी ने न्यायालय का ध्यान राज्य सरकार स्वयं के द्वारा जारी अधिसूचना दिनाँक 06.10.1993, परिपत्र दिनाँक 05.05.1999, निदेशालय के आदेश 22.05.2014, 24.02.1998 की ओर आकर्षित किया और बताया कि राज्य के चिकित्सा विभाग के अधिकारी ख़ुद ही राज्य सरकार के आदेश नहीं मान रहे हैं और याचीगण जैसे अल्प वेतनभोगी कर्मचारियों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं जो सविंधान की मूल प्रस्तावना (सामाजिक व आर्थिक न्याय) के ही विपरीत है।

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वित्त विभाग की अधिसूचना अनुसार याचिकाकर्ताओ को वेतनमान नहीं देने का कोई उचित कारण नहीं है। रिट याचिकाओं के पेश होने के बाद न्याय की प्रतीक्षा में 08 याचीगण तो सेवानिवृत भी हो गए हैं औऱ सही वेतनमान के अभाव में उन्हें कम पेंशन मिल रही है। राज्य में नियुक्त राज्य कर्मचारीयों को क्या-क्या वेतनमान मिलेगा,यह राज्य सरकार के वित्त विभाग के क्षेत्राधिकार में आता है लेकिन निदेशक (अराजपत्रित), चिकित्सा विभाग,जयपुर और सीएमएचओ जोधपुर द्वारा राज्य के वित्त विभाग की अधिसूचनाओं को ही नहीं मानना उनकी असंवेदनशीलता और हठधर्मिता को दर्शाता है,जो स्पष्ठत: विधि विरुद्ध और असवैधानिक है।

रिकॉर्ड पर आए तथ्यों का परिशीलन कर एवं याचीगण के अधिवक्ताओं के तर्कों से सहमत होते हुए न्यायाधीश अरुण मोंगा ने रिट याचिकाए स्वीकार करते हुए तीन माह के भीतर याचिकाकर्ता का वेतन रू 950-1680 में निर्धारित करते हुए 01.09.1988 से सेवा अवधि सत्यापन कर समस्त सेवा परिलाभ और नियमानुसार ब्याज़ के साथ एरियर का भुगतान करने के आदेश दिए। सेवानिवृत्त याचिकर्ताओं के पेंशन का पुन: निर्धारण कर सही पेंशन देने के भी आदेश दिए।

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