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स्व.दलपत परिहार की 7वीं पुण्य तिथि पर काव्यांजलि अर्पित

जोधपुर, शहर की अभिव्यक्ति संस्था द्वारा वरिष्ठ रंगकर्मी, निर्देशक और साहित्यकार स्व. दलपत परिहार की सातवीं पुण्यतिथि पर शनिवार को कृष्णानन्द स्वामी सभागार (गड्डी) सिवांची गेट में काव्य गोष्ठी का आयोजन कर काव्यांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम का आगाज शहर के जाने माने बांसुरी वादक संजय बोहरा द्वारा बांसुरी से स्वरांजलि दी गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ रंगकर्मी रमेश बोराणा ने तथा मुख्य अतिथि वरिष्ठ रंगनिर्देशक डॉ सुनील माथुर थे। दलपत परिहार को सभी ने पुष्पांजलि अर्पित कर अपनी रचनाओं तथा अपनी यादों के पल को साझा किया।

स्व.दलपत परिहार की 7वीं पुण्य तिथि पर काव्यांजलि अर्पित

शेखर देथा ने अपनी गजल में कहा- मन में हिन्दोस्तां रखता हूँ। तथा मां की दुआ है जो हमे मरने नहीं देती। रमेश भाटी नामदेव, हरि वैष्णव, लक्ष्मीकांत छैनु ने दलपतजी के साथ रंगमंच सम्बन्धी किये कार्यों के बारे में अपने विचार साझा किए। मंजू शर्मा जांगिड़ ने कविता में कहा-रामराज्य अब रहा नहीं,नकाब पहने दिख रहे है रावण। ओमप्रकाश वर्मा ने पैरोडी रचनाओं से गुदगुदाया। डॉ हितेंद्र गोयल ने अपनी कविता में कहा- मैं नाटक करता हूँ, क्योकि मुझे कटना पसंद नहीं, तथा राजस्थानी रचना-टाबर रौवे बिलखे मां सुनाई। मधु वैष्णव मान्या ने अपनी रचना में कहा- जितनी जरूरत थी उससे ज्यादा दौड़ गया हूँ, तथा प्यासी पनघट रो रही, तुम लौट आओ गांव। छगनराज राव दीप ने ‘बरसो से था बन्द उसे खुलवाया है, मैंने अपना कमरा आज सजाया है’ गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ नीतू परिहार ने किताबों में ही रहते हो रचना सुनाई। अशफाक़ अहमद फौजदार ने अपने कलाम में कहा- तुम तन्हाई में रहने की दुआ दो मुझको।श्याम गुप्ता ने- मौन बसा है दिल में मेरे, हर वक्त रहता मुझको घेरे’ गीत सुनाया। मोहनदास वैष्णव ने दलपत परिहार पर अपनी रचना में कहा- राजस्थानी रो झुंझार हो दलपत, नरां मांयने नर हो दलपत। खुर्शीद खैराड़ी ने अपनी गज़ल में कहा- हम अपनी ख़ताओं से चुराते नहीं आँखें। हम दिल की सदाओं से चुराते नहीं आँखे। दीपा परिहार ‘दीप्ति’ ने सुनाया- याद मुझे आते पापा। एनडी निम्बावत ने – कश्तियाँ कब तूफ़ां से डरी है…वो तो हमेशा ही लड़ी है। डॉ लीला दीवान ने “बाबुल के बाग की कली थी मैं…कितने नाजों से पली थी मैं”…गीत सुनाया। अंत में मुख्य अतिथि डॉ सुनील माथुर ने अपने अनुभवों को बताते हुए कहा- दूर तलक दिखाई दे रहा है एक स्याह सा धुंआ…चुप्पी ओढ़कर एक दिन तो जाना है मुझको…जैसी रचनाएं सुनाई।

तथा गोष्ठी के अध्यक्ष रमेश बोराणा ने अपनी दोस्ती के पलों को याद करते हुए कई लम्हों को तरोताजा किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि 56 वर्षो तक साथ रहा है, कोई नया नाटक आया होगा जिसे जिंदगी में कहीं खाँचा बनाया है। व्यसन से पूर्णतया मुक्त रहे जबकि वे सबके साथ रहते थे। मैंने एक दोस्त को जिया और झेला भी है। अपनी रचना में कहा- नी सुणी थांरी सिसकिया.. खेलता रहिया थारे तन अर मन सूं…… अबै उठ नुवै सूरज री उजास..सुनाया। हेमा भट्ट, तन्मय भट्ट, शाहीन अंसारी, रविराज बलाई सहित कुल 30 जन उपस्थित हुए। संचालन अभिव्यक्ति संस्था की सचिव दीपा परिहार ने तथा आभार संस्था के अध्यक्ष छगनराज राव ने प्रकट किया।

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