ट्रायल शुरू होने के बाद भी जमीन विवाद में मुकदमे का संशोधन संभव
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाएं की खारिज -मूल एग्रीमेंट पेश करने का आदेश कायम
जोधपुर(दूरदृष्टीन्यूज),ट्रायल शुरू होने के बाद भी जमीन विवाद में मुकदमे का संशोधन संभव। राजस्थान हाईकोर्ट ने जालोर में कृषि भूमि विवाद से जुड़े दो मामलों में जिला अदालत के आदेशों में दखल देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने मुकदमे में संशोधन की अनुमति और मूल एग्रीमेंट पेश करने के निर्देश को बरकरार रखा।
जस्टिस फरजंद अली ने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रायल शुरू होने के बाद भी परिस्थितियों के आधार पर मुकदमे में संशोधन की अनुमति दी जा सकती है। इसके लिए देखना होगा कि संशोधन वास्तविक विवाद के निपटारे में मददगार है या नहीं और उससे मुकदमे की मूल प्रकृति या दूसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित तो नहीं होते।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पक्ष को सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया गया हो, लेकिन वह उसका लाभ नहीं उठाए,तो बाद में केवल इस आधार पर आदेश को गलत नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मोती सिंह ने पैरवी की। प्रतिवादी पक्ष की ओर से डॉ.एए भंसाली ने पक्ष रखा।
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मामला जालोर जिले के भाद्रा जून गांव की खसरा संख्या 1353 की कृषि भूमि से जुड़ा है। वादी धनंजय गहलोत ने 13 मई 2019 के एग्रीमेंट के आधार पर शेष जमीन की रजिस्ट्री कराने और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए मुकदमा दायर किया था। उनका दावा था कि राजस्व मंडल, अजमेर के 12 सितंबर 2018 के फैसले के बाद भगवान दास जमीन के खातेदार बने थे। इसके बाद जमीन बेचने का एग्रीमेंट किया गया।
राजस्थान सरकार की याचिका का निपटारा 27 जनवरी 2023 को हुआ। इसके बाद 23 फरवरी 2023 को जमीन के 0.1618 हेक्टेयर हिस्से की रजिस्ट्री धनंजय गहलोत के पक्ष में हुई। लेकिन उनके अनुसार बाकी जमीन का ट्रांसफर नहीं हुआ और बाद में दूसरे पक्षों के नाम बिक्री विलेख कर दिए गए।
ट्रायल शुरू होने के बाद रजिस्ट्री रद्द करने की मांग जोड़ी
मुकदमे के दौरान धनंजय गहलोत ने प्लेंट यानी वादपत्र में संशोधन के लिए आवेदन दिया। उन्होंने 23 फरवरी 2023 को दूसरे पक्षों के नाम हुए बिक्री विलेख रद्द करने की मांग भी जोडऩे की अनुमति मांगी। जालोर जिला कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को संशोधन की अनुमति दे दी। इसके खिलाफ दूसरे पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि ट्रायल शुरू होने और गवाही की प्रक्रिया आगे बढऩे के बाद इस तरह का संशोधन नहीं किया जा सकता। उसने कहा कि रजिस्ट्री रद्द करने की नई मांग से मुकदमे की प्रकृति बदल जाएगी और उन्हें नुकसान होगा। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित बिक्री विलेख मुकदमा दायर होने से पहले ही किए जा चुके थे। इसलिए इसे केवल शुरुआती चूक या गलती मानकर बाद में जोडऩे की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा वास्तविक विवाद सुलझाना संशोधन का उद्देश्य
हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के तहत संशोधन की अनुमति देने का उद्देश्य पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद का निपटारा करना है।
हाईकोर्ट ने कहा कि शुरुआती चरण में हुई चूक या दलील को ठीक से पेश नहीं कर पाने के कारण किसी पक्ष को हर स्थिति में नुकसान नहीं उठाना चाहिए। हालांकि, संशोधन की अनुमति देना कोर्ट का असीमित अधिकार नहीं है। कोर्ट को देखना होगा कि प्रस्तावित संशोधन मूल विवाद से जुड़ा है या नहीं। इससे मुकदमे की बुनियादी प्रकृति बदल रही है,कोई असंबंधित विवाद जोड़ा जा रहा है या दूसरे पक्ष का पहले से प्राप्त कानूनी अधिकार प्रभावित हो रहा है, इन पहलुओं पर भी विचार जरूरी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल नए तथ्य जोडऩे या दावे को पेश करने का तरीका बदलने से संशोधन खारिज नहीं किया जा सकता। असल सवाल यह है कि क्या संशोधन मूल विवाद के दायरे से बाहर जा रहा है। शोधन,मुकदमे के चरण और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अनुमति दी थी। इसलिए उसके आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधन पर विचार करते समय यह भी देखना जरूरी है कि दूसरे पक्ष को ऐसा नुकसान तो नहीं होगा,जिसकी भरपाई पर्याप्त अवसर देकर नहीं की जा सकती। यदि दूसरे पक्ष को संशोधित दलीलों का जवाब देने का मौका दिया जा सकता है,तो केवल असुविधा के आधार पर संशोधन रोकना जरूरी नहीं है।
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