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राज्याभिषेक से लोकतांत्रिक शपथ तक : मर्यादा पथ

✍🏻पार्थसारथि थपलियाल

भारतीय लोकतंत्र में शपथग्रहण समारोह केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र,संविधान और जनता के प्रति अपने दायित्वों को स्वीकार करने का गंभीर अवसर है। इसकी तुलना प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था के राज्याभिषेक संस्कार से की जा सकती है। अंतर इतना है कि तब सत्ता राजा के हाथों में होती थी और आज लोकतंत्र में सत्ता जनता के हाथों में है। तब राजा राज्य और प्रजा के प्रति दायित्वबद्ध होता था,आज जनप्रतिनिधि संविधान और जनता के प्रति।

प्राचीन भारत में राज्याभिषेक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता था। राजपुरोहित राजा के मंगल स्नान से लेकर राजमुकुट धारण कराने तक पूरे समारोह का संचालन करता था। दूर-दूर से राजा-महाराजा और विशिष्ट अतिथि इस अवसर के साक्षी बनते थे। विद्वानों और पंडितों की मंडली वैदिक मंत्रों, स्वस्तिवाचन और मंगलाचरण से वातावरण को पवित्र बनाती थी। राजतिलक के बाद राजपुरोहित या राजगुरु राजा को उसके दायित्वों का स्मरण कराता था। उसे बताया जाता था कि राज्य की शक्ति व्यक्तिगत वैभव के लिए नहीं,बल्कि प्रजा के पालन,न्याय की स्थापना,धर्माचरण और राज्य की रक्षा के लिए है। धर्मदंड सत्ता की मर्यादा का प्रतीक था।

राजा सर्वोच्च सत्ता का धारक दिखाई देता था,किंतु वह भी धर्म और राजधर्म से ऊपर नहीं था। परंपरा में सेंगोल अथवा धर्मदंड इसी भाव का प्रतीक माना गया है कि सत्ता के साथ दायित्व और अधिकार के साथ मर्यादा का पालन राजधर्म है। राजा को यह स्मरण कराया जाता था कि उसके ऊपर धर्म और न्याय का अनुशासन है।

वचन की मर्यादा : भारतीय परंपरा की शक्ति 

भारतीय संस्कृति में वचन,प्रतिज्ञा और शपथ को अत्यंत गंभीर माना गया है। हमारे महाकाव्यों और इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ व्यक्तियों ने अपने वचन की रक्षा के लिए व्यक्तिगत सुख,सत्ता और जीवन तक को दांव पर लगा दिया। राजा दशरथ ने रानी कैकेयी को दिए हुए वचन का पालन उस समय किया,जब वे अपने प्रिय पुत्र राम का राज्याभिषेक करने जा रहे थे। पिता के वचन की मर्यादा रखने के लिए राम ने राजसिंहासन का त्याग कर वनवास स्वीकार किया।

चाणक्य के जीवन में भी संकल्प की शक्ति दिखाई देती है। नंदों के अपमान के बाद उन्होंने नंद सत्ता के उन्मूलन का संकल्प लिया और कहा-“जब तक नंदों का विनाश न कर दूँगा,तब तक अपनी शिखा नहीं बाँधूँगा।” उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को संगठित किया और अपने संकल्प को पूरा किया।

लोकतंत्र में शपथ: सत्ता नहीं,दायित्व:

आधुनिक भारत में राजा नहीं हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वही प्रतिनिधि संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेकर शासन की जिम्मेदारी संभालते हैं। समझने योग्य बात यह है कि जनप्रतिनिधि की निष्ठा संविधान के प्रति, दायित्व राष्ट्र के प्रति और न्याय समस्त नागरिकों के प्रति होनी चाहिए। शपथ की मर्यादा और भ्रष्टाचार का प्रश्न- भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे अनेक राजनेताओं के उदाहरण मिलते हैं जो उच्च संवैधानिक पदों पर रहे और बाद में विभिन्न आपराधिक अथवा भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायालयों द्वारा दोषी ठहराए गए। कुछ नाम उदाहरण के लिए हैं-लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला,पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम,झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जय ललिता, केंद्र में मंत्री रहे ए.राजा और कनिमोझी सहित कई शपथ- ग्रहण करने वाले नेता हैं जिन पर कोर्ट केस सिद्ध हुए हैं। ये सभी मामले अलग अलग कारणों से न्यायालय तक पहुंचे न कि संवैधानिक पदीय शपथ के उल्लंघन के कारण।

शपथ और आचरण के बीच दूरी
विडंबना यह है कि शपथग्रहण के समय जनप्रतिनिधि संविधान के प्रति निष्ठा,ईमानदारी और निष्पक्षता का संकल्प लेते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकतम जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते हैं और सार्वजनिक जीवन में उच्च आदर्शों का पालन करते हैं। कुछ जनप्रतिनिधि जो सत्तारूढ़ होते ही अनैतिक आचरण शुरू कर देते हैं,उनके मामले में यह व्यवस्था नहीं है कि जो जनप्रतिनिधि शपथ का उल्लंघन करे उस पर क्या कार्यवाही हो और कार्यवाही की संवैधानिक व्यवस्था क्या हो? शपथ पत्र और सत्यनिष्ठा जन प्रतिनिधियों द्वारा चुनाव के समय दिए जाने वाले शपथपत्रों का उद्देश्य मतदाताओं को उम्मीदवार की संपत्ति,देनदारियों,आपराधिक मामलों और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत कराना है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक पारदर्शिता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तंत्र बनाते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसे राजनीतिक प्रतिशोध का साधन न बनाया जा सके। लोकतंत्र में जवाबदेही जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक निष्पक्ष और स्वतंत्र परीक्षण भी है।

शपथ की भाषा: केवल वही जो संविधान में निर्धारित है
शपथग्रहण समारोह की गरिमा बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संवैधानिक पद की शपथ वही ली जाए जो कानून और संविधान में निर्धारित है। शपथ के निर्धारित प्रारूप में मनमाना परिवर्तन,राजनीतिक नारा अथवा किसी व्यक्ति,दल या संगठन के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन शपथ की मूल भावना को कमजोर करता है। राजा के हाथ में धर्मदंड था,लोकतांत्रिक भारत के जनप्रतिनिधि के हाथ में संविधान है।

अंतर केवल इतना है कि तब राजगुरु राजा को उसकी मर्यादा का स्मरण कराता था,आज जनप्रतिनिधि स्वयं संविधान के सामने शपथ लेकर अपनी मर्यादा स्वीकार करता है। इसलिए लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनाव में नहीं, बल्कि शपथ और आचरण के बीच की दूरी को समाप्त करने में है। शपथ के शब्द तभी सार्थक होंगे,जब वे जनप्रतिनिधि के व्यवहार में दिखाई दें। संविधान की पुस्तक पर हाथ रखकर लिया गया संकल्प यदि जीवन और सार्वजनिक आचरण में उतर जाए,तभी राज्याभिषेक की प्राचीन मर्यादा लोकतंत्र की आधुनिक जवाबदेही से जुड़ सकेगी।यही है-राज्याभिषेक से लोकतांत्रिक शपथ तक का मर्यादा पथ।