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राजनीति-दुष्प्रेरित विचार, राष्ट्र के लिए घातक

राष्ट्र प्रथम

✍🏻 पार्थसारथि थपलियाल

भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और सहिष्णुता रही है।यहां अनेक भाषाएं, जातियां,परंपराएं और विचारधाराएं होते हुए भी समाज को जोड़ने वाली मूल चेतना “सनातन” रही है। यही कारण है कि जब- जब कुछ राजनीतिक शक्तियां समाज को बांटने के लिए सनातन संस्कृति, जातियों या किसी विशेष वर्ग के विरुद्ध विषवमन करती हैं,तब वह केवल एक वर्ग पर आक्रमण नहीं होता,बल्कि भारतीय समाज की आत्मा को कमजोर करने का प्रयास होता है।

हाल के दिनों में कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा सनातन धर्म के विरुद्ध दिए गए बयान, एक पार्टी प्रवक्ता द्वारा ब्राह्मण समाज के लिए प्रयुक्त असभ्य शब्दावली और जातीय विद्वेष को हवा देने वाली भाषा यह संकेत देती है कि राजनीति का स्तर चिंताजनक रूप से गिरता जा रहा है। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं,लेकिन किसी संस्कृति,परंपरा या समाज के वर्ग विशेष के प्रति घृणा फैलाना कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोग समाज को स्वाभिमानी और सक्षम बनाने की बजाय उसे “पीड़ित” और “पिछड़ा” सिद्ध करने की राजनीति में अधिक रुचि लेने लगे हैं।

सनातन समाज की मूल भावना “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की रही है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा समाज को जोड़ने का कार्य किया है। यह सत्य है कि इतिहास में अनेक सामाजिक विकृतियां रही होंगी,लेकिन समय के साथ समाज ने आत्मसुधार भी किया है। आज आधुनिक शिक्षा,शहरीकरण और सामाजिक जागरूकता के कारण ऊंच-नीच और भेदभाव की पुरानी दीवारें धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। ऐसे समय में पुनः जातीय विद्वेष की आग सुलगाना राष्ट्रहित में नहीं कहा जा सकता।

चिंता का विषय यह भी है कि राजनीतिक लाभ के लिए समाज को “अगड़ा- पिछड़ा” के खांचों में बांटने का प्रयास निरंतर बढ़ रहा है। वोट बैंक की राजनीति ने सामाजिक समरसता को गहरी चोट पहुंचाई है। एक ओर कुछ नेता सनातन धर्म को समाप्त करने की बातें करते हैं,दूसरी ओर योग्यता और प्रतिस्पर्धा की अवधारणा को भी कमजोर करने की कोशिशें दिखाई देती हैं। यदि शिक्षा और प्रशासन में गुणवत्ता से समझौता होगा तो उसका दुष्परिणाम पूरे राष्ट्र को भुगतना पड़ेगा।

किसी भी विकसित राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसका सक्षम और गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन होता है। यदि योग्य और परिश्रमी विद्यार्थियों की उपेक्षा कर केवल राजनीतिक तुष्टिकरण के आधार पर व्यवस्थाएं बनाई जाएंगी, तो प्रतिभा हतोत्साहित होगी। यह स्थिति देश को आत्मनिर्भर और विकसित बनाने की दिशा में बाधा उत्पन्न करेगी। समाज में समान अवसर आवश्यक हैं,लेकिन समान अवसर और योग्यता के मानकों को समाप्त कर देना दो अलग बातें हैं।

सरकार का दायित्व यह होना चाहिए कि वह गरीब, वंचित और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा, कोचिंग,पुस्तकें और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे भी प्रतिस्पर्धा में समान रूप से भाग ले सकें,लेकिन अंतिम मूल्यांकन और चयन की प्रक्रिया निष्पक्ष तथा समान होनी चाहिए। यदि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर तय होंगी, तो इसका प्रभाव स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रशासन और न्याय जैसी मूल व्यवस्थाओं पर पड़ेगा।

भारत का भविष्य “विभाजनकारी राजनीति” में नहीं,बल्कि “समरस समाज” में निहित है। हमें यह समझना होगा कि किसी भी जाति या वर्ग को अपमानित करके सामाजिक न्याय स्थापित नहीं किया जा सकता। सामाजिक न्याय का अर्थ अवसर देना है,घृणा फैलाना नहीं। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में आत्मविश्वास,परिश्रम और स्वाभिमान की भावना को प्रोत्साहित किया जाए।

युवाओं को यह सिखाया जाए कि सफलता का मार्ग संघर्ष,शिक्षा और योग्यता से होकर जाता है,न कि केवल राजनीतिक नारों से।
सनातन संस्कृति ने सदैव कर्तव्य,मर्यादा और समरसता का संदेश दिया है। सभी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को संयमित भाषा और जिम्मेदार व्यवहार अपनाना चाहिए। आम जनता उसी को अपनाती है जिसे वे अपने नेता की भाषा मानते हैं।

राष्ट्र तभी मजबूत होगा जब समाज स्वाभिमानी, शिक्षित और सक्षम बनेगा। लोकलुभावन नीतियों की बजाय ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो प्रतिभा को प्रोत्साहित करें,गरीब को अवसर दें और समाज में समरसता बनाए रखें। भारत की शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता में है। इसे कमजोर करने वाली राजनीति अंततः राष्ट्र को ही कमजोर करेगी।